Radha Ashtami 2026: राधा रानी की सबसे छोटी सखी सुदेवी की कहानी, सितार बजाने में थीं माहिर, इब्राहिम लोदी ने तोड़ा था मंदिर
राधा रानी के जन्मोत्सव से पहले उनकी प्रिय सखी सुदेवी की कहानी सामने आई है, जो सितार बजाने में माहिर ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
राधा रानी की सबसे छोटी सखी सुदेवी की कहानी।
सुदेवी सितार बजाने में माहिर थीं, कृष्ण लीलाओं में स्थान।
इब्राहिम लोदी ने सुनहरा स्थित सुदेवी मंदिर तोड़ा था।
अभिषेक सक्सेना, मथुरा। Radha Rani Temple History कृष्ण प्रिया राधारानी का जन्मोत्सव 1९ सितंबर को मनाया जाएगा। कान्हा जन्मोत्सव के बाद पूरा ब्रज मंडल उनकी प्राण प्रिय शक्ति राधारानी के जन्मोत्सव में जुट जाता है। विश्व विख्यात राधारानी मंदिर में राधारानी भगवान श्रीकृष्ण के साथ विराजमान होकर दर्शन देती है।
वहीं विशेष आयोजनों पर राधारानी की सबसे प्रिय सखी ललिता व विशाखा राधाकृष्ण के साथ मंदिर परिसर में विराजमान होती हैं। वहीं राधा की एक और प्रिय सखी थीं, जिनका नाम था सुदेवी।
बरसाना को आदि वृंदावन कहा जाता है। अष्ट दल कमल की संकल्पना में कमल के मध्यभाग में राधारानी का स्थान है। कमल के आठ दलों के रूप में उनकी अष्ट सखिया विराजमान हैं। इसी तरह कमल के मध्य भाग में बरसाना है और इसके चारों ओर अष्ट सखियों के गाव मौजूद हैं।
बरसाना से पांच किलो मीटर दूर है सुनहरा गांव
Radha Ashtami Story राधा की सबसे छोटी और प्रिय सखी सुदेवी का गांव सुनहरा वर्तमान में भरतपुर जिले में है। राधा की सबसे छोटी सखी सुदेवी इतना अच्छा सितार बजाती थीं कि भगवान कृष्ण ने उन्हें अपनी नित्य लीलाओं में वाम स्थान दिया। सुदेवी के गांव सुनहरा है, बरसाना से पांच किमी दूर सुदेवी सखी का मंदिर है।

राधा रानी की मूर्ति।
सुदेवी के कार्य
- शृंगार सेवा: सुदेवी जी हमेशा श्री राधा रानी के पास रहकर उनके केश (बाल) संवारती हैं और नयनों में अंजन (काजल) लगाती हैं।
- जल सेवा: रास नृत्य के बाद जब प्रिया-प्रीतम थक जाते हैं, तब सुदेवी जी उन्हें सुगंधित और दिव्य पेयजल अर्पित करती हैं।
इब्राहिम लोदी को इसकी ख्याति सहन नहीं हुई
Radha Ashtami Story: बृजाचार्य पीठाधीश गोस्वामी दीपक राज बताते हैं कि सुनहरा में सुदेवी के मंदिर का निर्माण चौदहवीं शताब्दी में रीवा के शासक किशन देवजूं ने कराया था। रीवा नरेश ने अष्ट सखियों के हर गाव में मंदिर बनवाए। सुदेवी का मंदिर इतना विशाल था कि छह कोस दूरी पर स्थित छाता से भी इसकी रोशनी दिखाई देती थी। इब्राहिम लोदी को इसकी ख्याति सहन नहीं हुई। इस समेत ब्रज के तमाम मंदिरों को तोड़ा गया। मंदिर को धर्मप्रेमी लोगों के सहयोग से एक बार खड़ा किया गया और मंदिर की सेवा व्यवस्था के लिए गाव पंचायत ने 18 बीघा जमीन उपलब्ध करा दी, जिससे मंदिर का संचालन अभी भी हो रहा है।
