बाबा नीब करौरी ने वृंदावन को बनाया लीला का केंद्र, 'हनुमान अंश' के बाद बढ़ गई भीड़
फिल्म 'हनुमान अंश' के बाद नीब करौरी बाबा एक बार फिर चर्चा में हैं, जिनका अंतिम पड़ाव वृंदावन रहा जहाँ ...और पढ़ें

वृंदावन में बाबा नीब करौरी आश्रम।
HighLights
नीब करौरी बाबा ने वृंदावन में 1973 में महासमाधि ली।
बाबा का जीवन हनुमान भक्ति से गहराई से जुड़ा था।
संवाद सहयोगी, वृंदावन। फिल्म ‘हनुमान अंश’ सिनेमाघरों में धूम मचा रही है और इस फिल्म के आने के बाद से ही नीब करौरी बाबा एक बार फिर चर्चा का विषय बन गए हैं. नीब करौरी बाबा का नाम आते ही सबसे पहले उत्तराखंड का कैंची धाम याद आता है। पहाड़ों के बीच बसा यह आश्रम आज देश-दुनिया में बाबा के भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है।
लेकिन बाबा की कहानी सिर्फ कैंची धाम तक सीमित नहीं है। उनके जीवन का आखिरी पड़ाव वृंदावन रहा। जहां उन्होंने 11 सितंबर 1973 को देह त्यागी और बाद में वहीं उनकी समाधि बनाई गई। बाबा नीब करौरी का उत्तराखंड का कैंची धाम बाबा की तपोस्थली और आश्रम है, जबकि उनकी मुख्य समाधि वृंदावन में है।
बाबा का जीवन भगवान हनुमान की भक्ति से गहराई से जुड़ा माना जाता है। वृंदावन भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध वृंदावन सदियों से संतों और साधकों की भूमि रहा है। 1973 में बाबा की तबीयत खराब रहने लगी थी।
सितंबर की शुरुआत में वे आगरा की ओर गए थे, इसी दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। बताया जाता है कि उन्हें ट्रेन से वृंदावन लाया गया। उन्हें इलाज के लिए रामकृष्ण मिशन अस्पताल ले जाया गया। लेकिन, डाक्टर उन्हें बचा नहीं सके। 11 सितंबर 1973 को अनंत चतुर्दशी के दिन नीब करौरी बाबा ने वृंदावन में अपनी देह त्याग दी।
उनके भक्त इसे सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि ‘महासमाधि’ के रूप में याद करते हैं। बाबा की अंतिम यात्रा भी उसी वृंदावन में पूरी हुई, जिससे उनका आध्यात्मिक रिश्ता लंबे समय से जुड़ा था। अब फिल्म हनुमान अंश आने के बाद इस आश्रम पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है।
ये है बाबा का इतिहास
बाबा नीब करौरी का स्मरण करते हुए समाजसेवी राधाकृष्ण पाठक बताते हैं कि उप्र के फिरोजाबाद जिले के टूंडला-आगरा के मध्य ग्राम अकबरपुर में 1900 में बाबा महाराज का जन्म जमींदार कुलीन ब्राह्मण परिवार के दुर्गाप्रसाद शर्मा एवं माता कौशल्या देवी के घर में हुआ। बपचन में आपका नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था।
बाबा 11 वर्ष की आयु में घर त्याग कर नागा साधुओं के साथ भ्रमण करते हुए गुजरात के मोरबी के गांव बबनियां में पहुंचे। जहां एक सरोवर के किनारे श्रीहनुमानजी की मूर्ति की स्थापना कर तपस्या प्रारंभ कर दी। बाबा 17 वर्ष की अवस्था में श्रीहनुमानजी से एक हो गए। इसके बाद प्रसिद्धी के कारण वहां की लीलाएं करके स्थान त्याग दिया।
इसके बाद बाबा ने परिव्राजन के रूप में लोक कल्याण के लिए भ्रमण करते रहेे। इसके बाद फर्रुखाबाद की भूमि को अपना लीला केंद्र बनाया। यहां नीब करौरी नामक स्थान पर ट्रेन रोककर रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया। इसके बाद यहां प्रसिद्धि के कारण उत्तराखंड के कुमायुं मंडल में नैनीताल के समीप कैंचीधाम को अपना लीला केंद्र बनाया।
1965 में जमाया वृंदावन में डेरा
इसके बाद अपनी लीला की पूर्णाहुति और महासमाधि के लिए बाबा महाराज ने 1965 में वृंदावन में डेरा जमाया। 1965 में वृंदावन के अटल्ला चुंगी परिक्रमा मार्ग में बाबा के मन में अपना आश्रम बनाने का संकल्प लिया, तो तत्कालीन राजपुर गांव के प्रधान ठाकुर किशन सिंह से भूमि को क्रय की।
एक दिन राजपुर ग्राम में संचालित गुरूकुल विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के रूप में पढ़ाकर लौट रहे उनके पिता बनवारीलाल पाठक को आश्रम भूमि के बाहर बैठे बाबा ने आवाज लगाकर बुलाया और कहा श्रीहनुमानजी की शरण को ग्रहण करो, तुम मेरी पिछली लीला में थे। अब प्रोफेसरी छोड़कर हनुमानजी की लीलाओं को ग्रहण करो।
पाठक ने बताया 11 सितंबर 1973 अनंत चतुर्दशी के दिन बाबा नीब करौरी ने अपनी लीला को पूर्ण की। तब उन्होंने सबसे अंत में अपनी वृंदावन लीला के दौरान भक्त रहे बनवारीलाल पाठक को बुलाया और उनके सामने अपनी लीला को पूर्ण की।
वे इस महासमाधि लीला के साक्षी थे। इसके बाद उनके ही निर्देशन में बाबा नीब करौरी महाराज के महासमाधि स्थल का निर्माण कार्य हुआ। जहां जाकर भक्तों की सभी मनोकामनाएं आज भी पूर्ण हो रही हैं।
