मथुरा, जासं। सरकार की तमाम कवायद के बाद मथुरा के लघु उद्योगों की हालत खराब है। टीटीजेड की बंदिश से जूझ रहे उद्योगों को देश में चल रही मंदी की हवा ने और बीमार कर दिया है। टोंटी उद्योग सहित कई इकाइयां बंद हो चुकी हैं, तो कई बंदी की कगार पर हैं।

मथुरा में नए उद्योग के लिए माहौल की बात को छोड़िए पुराने ही अपना वजूद नहीं बचा पा रहे हैं। जिले की पहचान कहे जाने वाले टोंटी उद्योग की कभी 100 इकाइयां होती थीं। देश-विदेश में आपूर्ति थी। अब धीरे-धीरे सिमटती हुई यह संख्या लगभग आधी रह गई हैं। उद्यमी बताते हैं पिछले साल से रियल एस्टेट में मंदी से टूटा कारोबार उबर नहीं सका है। अन्य शहरों में लगातार खुल रही यूनिट्स से मिल रही प्रतिस्पर्धा ने भी इसे प्रभावित किया है। बड़ी और मल्टीनेशनल कंपनियों की दस्तक से बाजार खराब हो गया। यही कारण कि उद्यमी अन्य कारोबार में संभावनाएं तलाशने लगे।

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डिस्पोजेबल आइटम इंडस्ट्री: डिस्पोजेबल आइटम में आने वाले पेपर कप, प्लेट्स ग्लास आदि आते हैं। यह इंडस्ट्री भी इस समय अपने अस्तित्व से जूझ रही है। उद्यमी बताते हैं कि प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बाद इकाइयां बंद पड़ी हैं। कुल मिलाकर पांच-छह इकाइयां ही थीं। कुछ ने प्लास्टिक के स्थान पेपर से बने डिस्पोजेबल आइटम का काम डाल लिया। एक चौथाई भी नहीं बचे उद्योग: नेशनल चैंबर अध्यक्ष केडी अग्रवाल का कहना है कि 32 साल पहले अस्तित्व में आए टीटीजेड के कारण मथुरा के एक चौथाई उद्योग खत्म हो गए। वर्ष 1986 के बाद से कोई बड़ी इंडस्ट्री मथुरा में नहीं लगी। 87 में ही रिफाइनरी टीटीजेड के कारण आधी ही स्थापित हो सकीं। उसका पेट्रो केमिकल कांप्लेक्स पानीपत स्थानांतरित करना पड़ा। वर्ष 2016 में व्हाइट कैटेगरी में आने वाले उद्योगों पर पांच हजार वर्गमीटर से अधिक इलाके में निर्माण प्रतिबंधित कर दिया गया। जिले में तब से बीस कमरों का कोई होटल नहीं बन सका है। चैंबर ने इस बारे में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इंडस्ट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर श्रेणी निर्धारित करने को कहा है। मार्च 18 में आगरा के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण यह अटका हुआ है। प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपना विजन डॉक्यूमेंट अदालत में दाखिल किया है। ये वैश्विक मंदी का असर है

'सरकार का पूरा फोकस लघु उद्योगों की तरफ बना हुआ है। बहुत ज्यादा धन देने का प्रयास हो रहा है। फिर भी सरकारी योजना एक तरफ होती है और व्यवहारिकता एक तरफ। ये मंदी सरकार की अड़चन के कारण नहीं है। जल्द हालात सही हो जाएंगे।'

- राकेश गर्ग, राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव लघु उद्योग भारती टीटीजेड से मथुरा की इंडस्ट्री को हो रहे नुकसान को लेकर चैंबर पिछले कई वर्षों से संघर्ष कर रहा है। 32 साल पहले अस्तित्व में आए टीटीजेड के कारण मथुरा के उद्योग एक चौथाई भी नहीं बचे हैं। वर्ष 2016 में उद्योगों की श्रेणी के तहत व्हाइट कैटेगरी के उद्योगों पर शर्तें थोप दी गईं।

केडी अग्रवाल, अध्यक्ष नेशनल चैंबर ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स सरकार प्लास्टिक डिस्पोजेबल की जगह मिट्टी से बने उत्पाद लाना चाह रही है। मगर, शायद कम ही लोग जानते हैं कि मिट्टी को पकाकर उससे घड़े, कुल्हड़ आदि बनाए जाते हैं। पकने के बाद मिट्टी डिसॉल्व होना बंद हो जाती है। यही कारण खुदाई में बरसों से पहले के भी मिट्टी से बने उत्पाद सही सलामत निकलते हैं।

अभिषेक वशिष्ठ, उद्यमी तगड़ी प्रतिस्पर्धा और डिमांड नदारद होने के कारण अपनी टैप्स एंड कॉक्स की यूनिट बंद कर चुका हूं। कृष्णा नगर में इकाई स्थापित की थी। जबकि बचपन से इस काम से जुड़ा हुआ था। कई शहरों में इकाइयां खुलने के बाद से काम करना मुश्किल हो चुका था। अगर डिमांड भी होती, तो भी काम चल जाता। करोड़ों का नुकसान हुआ है।

ब्रज भूषण कालरा, उद्यमी

Posted By: Jagran

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