मथुरा का डैंपियर नगर... क्यों पड़ा ये नाम, 110 साल पुराना है इसके पीछे इतिहास
मथुरा के डैंपियर नगर का नामकरण ब्रिटिश काल के आइसीएस अधिकारी जीआर डैंपियर के नाम पर हुआ था। यह क्षेत्र ...और पढ़ें

मथुरा का डैंपियर नगर पार्क चौराहा।
जागरण संवाददाता, मथुरा। कान्हा की नगरी की गलियों और मुहल्लों के नामों में इतिहास की कई परतें छिपी हैं। इन्हीं में एक नाम है डैंपियर नगर। शहर के पाश इलाकों में शुमार इस क्षेत्र का नाम ब्रिटिश शासन के दौर की याद दिलाता है। 1910 में आइसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) अफसर जीआर डैंपियर जिले के कलक्टर व म्यूनिसपल बोर्ड आफ मुटरा (अंग्रेजी दस्तावेजाें में मथुरा का नाम) के चेयरमैन थे।
डैंपियर नगर की पहचान के साथ डैंपियर पार्क का इतिहास भी जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले में दर्ज विवरण के अनुसार म्यूनिसपल बोर्ड आफ मुटरा ने वर्ष 1915 में सार्वजनिक उपयोग के लिए डैंपियर पार्क विकसित करने का प्रस्ताव किया था। इसके लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी।
वर्तमान में जो पार्क पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम से जाना जाता है, उस समय वही डैंपियर पार्क कहलाता है। इस पार्क के आस-पास जो आवासीय क्षेत्र विकसित हुआ वह डैंपियर नगर कहलाया जाने लगा। इससे पहले यहां 1914 में जुबली पार्क की शुरुआत हो चुकी थी, जो शहर का खेल केंद्र था। आज जुबली पार्क के स्थान पर नगर निगम ने बहुमंजिला पार्किंग स्थापित कर दी है।
आज शहर का डैंपियर नगर क्षेत्र केवल आवासीय क्षेत्र भर नहीं रह गया है। यहां प्रमुख प्रतिष्ठानों के शोरूम स्थापित हैं। यहां का बाजार खेलकूद के सामान का हब माना जाता है। गोलचक्कर पार्कों के लिए मशहूर इस क्षेत्र में बलिदानी भगत सिंह पार्क के साथ विश्वप्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय है, जहां बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। अंग्रेज कलक्टर के नाम पर बसे इस नगर में शहर की धड़कनें बसती हैं।
अंग्रेज कलक्टर जीआर डैंपियर के नाम पर यहां पहले पार्क बना। उसके बाद उनके नाम पर आवासीय क्षेत्र विकसित हुआ। करीब 1910 में यहां पर जीआर डैंपियर रहे थे। 1914 में जुबली पार्क के पट्टे के दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर हैं। यहां बड़-बड़ी आवासीय कोठियां बनने लगीं। उस समय यहां अंग्रेज भी ज्यादा नहीं थे, केवल अधिकारी ही थे जो आफिसर कालानी में रहा करते थे।
-कमल चावला, पदाधिकारी जुबली एसो., डैंपियर नगर
अंग्रेज कलक्टर के नाम पर यहां आवासीय कालानी विकसित हुई। 3600 से लेकर 3800 वर्ग गज तक के प्लाट काटे गए थे। करीब 60 प्लाट काटे गए होंगे। हमारे दादा जी ने 1932 में यहां पर कोठी बनवाई थी। उस समय इतनी ज्यादा कोठियां नहीं थीं। आज यहां भले ही बाजार बन गया हो, लेकिन बुजुर्गों से सुना है। उस दौर की शान ही अलग थी।
- सुनील भार्गव एड. , डैंपियर नगर
