हाथरस ही नहीं मथुरा की रबड़ी भी फेमस, 90 साल से नहीं बदला इसका लच्छेदार स्वाद
मथुरा के चौमुहां विकास खंड स्थित तरौली गांव की लच्छेदार रबड़ी 90 वर्षों से अपनी शुद्धता और पारंपरिक स्वाद के ...और पढ़ें

मथुरा के तरौली में लच्छेदार रबड़ी बनाते हरी सेठ।
HighLights
स्व. सेठ मुंशी लाल ने शुद्धता की यह अनूठी परंपरा शुरू की थी।
धीमी आंच पर भैंस के दूध से पारंपरिक विधि से तैयार होती है।
जागरण संवाददाता, मथुरा। रबड़ी केवल हाथरस ही नहीं मथुरा की भी मुंह में पानी ला देने वाली है। कान्हा की पावन नगरी केवल पेड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि चौमुहां विकास खंड स्थित तरौली गांव की लच्छेदार रबड़ी के लिए भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। तरौली की यह पहचान करीब 90 वर्षों से है।
स्व. सेठ मुंशी लाल द्वारा शुरू की गई शुद्धता की यह अनूठी परंपरा आज उनके पुत्र हरी सेठ आगे बढ़ा रहे हैं। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों से आने वाले लोग भी जब एक बार इस रबड़ी का स्वाद चखते हैं, तो इसकी शुद्धता और स्वाद की प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाते।
तरौली की इस मशहूर रबड़ी को तैयार करने की विधि पूरी तरह पारंपरिक और धैर्य से भरी है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले शुद्ध और गाढ़े फुल क्रीम भैंस के दूध को लोहे की भारी कड़ाही में डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। जैसे ही दूध उबलने लगता है और सतह पर मलाई की मोटी परत जमने लगती है।
कारीगर उसे खुरचनी की मदद से कड़ाही के किनारों पर चिपकाते जाते हैं। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है जिससे दूध धीरे-धीरे गाढ़ा होकर लगभग एक-तिहाई रह जाता है।
हरी सेठ बताते हैं कि जब दूध पूरी तरह गाढ़ा हो जाता है, तब इसमें प्राकृतिक मिठास को ध्यान में रखते हुए संतुलित मात्रा में चीनी मिलाई जाती है। अंत में कड़ाही के किनारों पर चिपकी मलाई की तमाम परतों को खुरचकर उस गाढ़े दूध में मिला दिया जाता है, जिससे रबड़ी में असली लच्छेदार बनावट आती है।
खुशबू के लिए इसमें पिसी हुई हरी इलायची और बारीक कटे मेवे मिलाए जाते हैं। धीमी आंच पर घंटों की मेहनत और बिना किसी मिलावट के तैयार होने वाली यह लच्छेदार रबड़ी ही तरौली की असली पहचान है, जो नौ दशकों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है।
