योगेश जादौन, मथुरा: बहुत कम लोगों को ही यह बात मालूम होगी कि गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने ब्रजबुलि (बंगाली और ब्रज से मिल-जुलकर बनी भाषा) में तमाम वैष्णव पद लिखे। भानु ठाकुर के छदम नाम से उन्होंने इन पदों पर रसखान की ही तरह ब्रज में जन्म लेने की इच्छा जताई। महाप्रभु चैतन्य से लेकर टैगोर तक बंगाल एवं ब्रज के बीच इस परम्परा ने ब्रज के सांस्कृतिक परि²श्य को खूब गहराया है। टैगोर का मन भी ब्रज को लेकर कुछ उसी तरह लालायित रहता था जैसा रसखान का था। अंतर यह रहा कि रसखान एक बार ब्रज आए तो यहीं के होकर रह गए और टैगोर के ब्रज आने का कोई वृतांत नहीं मिलता है। अलबत्ता नए शोधों से यह जरूरत पता चलता है कि उनका मन ब्रज को लेकर खूब रमता था। 16वीं सदी में चैतन्य की राधाकृष्ण भक्ति का जो प्रभाव बंगाल पर पड़ा उसका असर गुरुदेव के जीवन पर गहरे तक देखा जा सकता है। दरअसल उस दौर में बंगाल से आकर ब्रज-वृन्दावन में वास करने वाले साधकों की वैष्णव भक्ति के कारण बंगाली और ब्रजभाषा का मिलन हुआ और साहित्य में इन दोनों के मिलन से एक नई भाषा ब्रजबुलि विकसित हुई। ऐसे साधकों ने इस भाषा में खूब वैष्णव पद लिखे और गाए। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की ऐसी वैष्णव पदावलियों के प्रति श्रद्धा थी। गुरूदेव का जन्म 7 मई 1861 को बंगाल में हुआ। संस्कृति मंत्रालय की देवालय की शब्दावली के संकलन और शोध परियोजना पर काम कर रहीं शोध अध्येता प्रगति शर्मा का कहना है कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने एक पत्र में यह उद्घाटित किया है कि जब उनकी आयु 13-14 वर्ष की थी। तब ही उन्होंने आनन्दपूर्वक वैष्णव पदावलियों का पाठ किया। यह संस्कार ही उनकी ब्रजबुलि रचनाओं के सृजन का सबब बना। टैगोर के द्वारा ब्रजबुलि में रचित पहला पद इस तरह है।

गहन कुंज मांझ, मृदुल मधुर वंसी बाजे। बिसरि त्रास लोक लाज, सजनी आओ हो।।

आओ आओ सजनी वृन्द, हिरब सखी श्री गोविन्द।श्याम कौ पदार बिन्दु भानु ¨सह बंदी है।

गुरुदेव ने भानु ¨सह ठाकुर कल्पित नाम से ब्रजबुलि में प्रचुर रचनाएं कीं। इससे पाठक इस भ्रम में भी बने रहे कि ये पद किसी भानु ¨सह नामक पुराने वैष्णव के द्वारा रचे हुए हैं। सन् 1884 में उनकी 23 वर्ष की उम्र में भानु ¨सह ठाकुरेर पदावली का प्रकाशन हुआ था।

गुरूदेव रचित सूरदासेन प्रार्थना कविता भी इनका ब्रज प्रेम दर्शाने वाली है। इसमें टैगोर ने ब्रजभाषा के महाकवि सूरदास के प्रति अपनी श्रद्धा को अभिव्यक्त किया है।

गुरुदेव रसखान की तरह ही अगले जन्म में ब्रजवासी होना की कल्पना करते थे। उन्होंने रसखान की तर्ज पर ही लिखा-

यदि पर जन्में पाइ रे, होते ब्रजेर राखाल बालक।

तबै निबिए देवो निजेर घरे सुसभ्यतार आलोक।।

(यदि मैं अगले जन्म में ब्रज का ग्वाल-बाल हो सकूं, तो अपने घर में सुसभ्यता के प्रकाश को फैलाऊंगा)

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ब्रज और बंगला शब्दों के समन्वय की ब्रजबुलि परम्परा का विस्तार एक जमाने में उड़ीसा और आसाम तक हुआ। यही कारण है चैतन्य से लेकर टैगोर तक यह परम्परा ब्रज और बंगाल की एकरूपता को दर्शाने वाली है। आचार्य जीव गोस्वामी के निर्देशन में वृन्दावन से तैयार की गई पोथियां 16 वीं सदी में नरोत्तमदास ठाकुर एवं श्री निवासाचार्य के द्वारा बंगाल तक प्रचारित की गई। रवीन्द्रनाथ टैगोर का ब्रज प्रेम इसका प्रमाण है।

--प्रगति शर्मा, शोध अध्येता

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