मथुरा, जासं। सरकारी मशीनरी में काबिज स्थानीय अधिकारी अब गोवर्धन में राष्ट्रीय हरित अधिग्रहण के दखल को दबे सुर से गलत बता रहे हैं तो शासन गोवर्धन श्राइन बोर्ड के प्रस्ताव को खारिज कर चुका है, लेकिन 20 साल पहले भी इसी सरकारी मशीनरी के दो तत्कालीन जिलाधिकारी ने प्रमुख मंदिरों के अधिग्रहण की संस्तुति शासन में की थी।

गिरिराज परिक्रमा मार्ग के प्रमुख मंदिरों में आने वाली भेंट और चढ़ावा राशि के बंदरबांट और इस धन संपदा को हथियाने के लिए झगड़े आदि होने की घटनाएं वर्षो से चली आ रही हैं। तीन प्रमुख मंदिरों में आने वाली दान राशि को लेकर एकाध बार कानून व्यवस्था की स्थिति भी खराब हो चुकी है। इनके प्रकरण सिविल न्यायालयों और उच्च न्यायालय में हमेशा से लंबित रहे हैं।

20 साल पहले जब दानघाटी मंदिर में भेंट राशि के संबंध में झगड़े बढ़े तो तत्कालीन जिलाधिकारी संजीव मित्तल ने पांच जून, 2000 को अपने अधीनस्थ एडीएम वित्त आरडी पालीवाल को जांच के लिए अनुसंधान अधिकारी नियुक्त किया। पालीवाल ने 22 जून, 2000 को अपनी विस्तृत रिपोर्ट उन्हें सौंपी। इसमें दानघाटी मंदिर में व्याप्त भ्रष्टाचार उजागर किया गया था। तत्कालीन डीएम मित्तल ने यह रिपोर्ट अपने पत्र के साथ 29 जून, 2000 को प्रमुख सचिव धर्मार्थ कार्य विभाग को प्रेषित की, जिसमें मंदिर अधिग्रहण के संबंध में कार्रवाई की अपेक्षा की गई थी।

इसके बाद तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. रमाकांत शुक्ला ने तीन अगस्त, 2002 को फिर से प्रमुख सचिव धर्मार्थ कार्य को पत्र लिखा। इससे पहले उन्होंने एसडीएम सदर से यहां के मंदिरों की जांच भी कराई। उन्होंने शासन को भेजे पत्र में कहा कि दानघाटी मंदिर को गिर्राज सेवा समिति चला रही है। इसमें उन्होंने भेंट चढ़ावे में आने वाली अनुमानित आय का उल्लेख किया और बताया कि इस भारी धन संपदा को लेकर समिति में अक्सर झगड़े होते रहते हैं। तीर्थ यात्रियों की धार्मिक भावनाएं आहत होने का हवाला देते हुए अधिग्रहण को ही समस्या का ही सर्वोत्तम निदान बताया था, लेकिन स्थानीय पुरोहितों के दबाव में तत्कालीन मायावती और अखिलेश सरकार में भी यह फाइल आगे नहीं बढ़ पाई थी।

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डेढ़ करोड़ थी आमदनी

मथुरा: गिरिराज परिक्रमा मार्ग के तीन प्रमुख मंदिर सालों से धनाढ्य रहे हैं। सन 2002 में जब तत्कालीन डीएम डॉ. रमाकांत शुक्ला ने इसकी जांच कराई तो दानघाटी मंदिर की अनुमानित आय ही करीब डेढ़ करोड़ बताई गई थी। इसके अलावा मुकुट मुखारबिद और जतीपुरा मंदिर की आय अलग थी। अब इस आय में कई गुना इजाफा हो चुका है और पुरोहित इस धन संपदा पर कुंडली मारकर बैठे रहने के लिए पर्दे के पीछे से हर जतन कर रहे हैं।

Posted By: Jagran

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