मथुरा, जासं। अगले माह कान्हा की नगरी एक बार फिर बप्पा के जयकारों से गूंजने वाली है। यही कारण है कि गणपति की स्थापना के लिए भक्त बेकरार है। मगर, इससे पहले मथुरा की रज से विघ्न विनाशक को तैयार करने का काम जोरों से चल रहा है। भगवान गणेश की छह इंच से लेकर 10 फुट तक की प्रतिमा को आकार दिया जा रहा है।

दो सितंबर को गणेश चतुर्थी का आरंभ होने जा रहा है। इस दिन बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में गणेश जी की पूजा की जाती है। गणेश स्थापना से ही गणेशोत्सव की शुरुआत हो जाती है और 10 दिन के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन यह उत्सव पूर्ण होता है। इस दौरान बप्पा को धूमधाम से घर में प्रवेश कराया जाता है। इसी उत्साह से उन्हें विसर्जित भी किया जाता है। अभी तक पर्व को महाराष्ट्र में बेहद उत्साह से मनाया जाता था, लेकिन अब देश में कई जगह आयोजन होने लगे हैं। शहर में भी कई जगह छोटे-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं। कई फुट ऊंची प्रतिमा लाकर स्थापना कराई जाती है। सुबह शाम पूजा-अर्चना, भजन कीर्तन चलते रहते हैं। नौ दिन के इस पर्व में कुछ कारोबार की चांदी हो जाती है। जिसमें सबसे प्रमुख मूर्तियां बनाने वालों का है। इसका मुख्य कार्य शहर के अंबाखार में होता है। करीब 15 परिवार बरसों से इस काम से जुड़े हैं। नवरात्र, दीपावली आदि त्योहार में प्रतिमाएं बनाते हैं। यहां से कई शहरों में आपूर्ति होती है। जिसमें उप्र के अलावा हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि शामिल हैं। मूर्तिकार पूरनचंद बताते हैं कि पर्व को लेकर मूर्तियां बिकने की शुरुआत हो चुकी है। मगर, तेजी त्योहार से एक दो दिन पूर्व ही आएगी। इसी तरह रामकिशोर बताते हैं कि छह इंच से लेकर 10 फुट की मूर्तियां बिक जाती है। इसी हिसाब से सामान तैयार किया जाता है। इनकी कीमत 40 रुपये से लेकर 11 हजार रुपये है। मोदक का लगता भोग: माना जाता है कि बप्पा को मोदक पसंद है। यह भी मुख्य रूप से महाराष्ट्र में ही बनाया जाता था, लेकिन अब मांग को देखते हुए यहां भी बनने लगा है। मिष्ठान विक्रेता धीरज चौधरी के मुताबिक पहल भक्त लड्डू लेकर भी काम चला लेते थे, अब बकायदा मोदक की मांग करते हैं। यह खोआ, गुड़, नारियल आदि से तैयार किया जाता है। यहां लगते पंडाल: आर्मी एरिया, द्वारिकाधीश मंदिर के पीछे, धौलीप्याऊ, डैंपियर नगर, कृष्ण नगर, सदर आदि विभिन्न क्षेत्रों में भक्त पंडाल लगाते हैं।

Posted By: Jagran

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