कोसीकलां(मथुरा), संसू। जिस कटोरे में अब धान लहलहा रहा है, उसमें कभी गन्ने का रस हुआ करता था। सत्ता की प्राथमिकता ऐसी बदली कि 70 के दशक में बेहतरीन मुनाफे वाली छाता शुगर मिल पर वर्ष 2008 में बंदी का बोर्ड लटक गया। तब से मथुरा जिले की राजनीति में शुगर मिल चुनावी रसगुल्ला बनी हुई है।

छाता में हाईवे किनारे शुगर मिल की स्थापना वर्ष 1969 से 74 तक विधायक रहे बाबू तेजपाल सिंह ने कराई। 1971 में मंजूरी के बाद शुगर मिल 1976 में बनकर तैयार हो गई। किसानों में भी गन्ने की फसल के प्रति खासा लगाव हो गया। वर्ष 1977 में शुरू हुए पहले पेराई सत्र के लिए 11937 हेक्टयर में गन्ना की पैदावार हुई।

इस दौरान शुगर मिल में पांच लाख 62 हजार 796 कुंतल गन्ना पहुंचा। किसानों एवं मिल की ऐसी जुगलबंदी हुई कि इसके मुनाफे से घाटमपुर शुगर मिल लगाई गई। वर्ष 1996-97 में किसानों ने सर्वाधिक 27001 हेक्टेयर में गन्ना उगाया, लेकिन मिलेनियम वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही इसके संचालन की गति धीमी पड़ गई। हालांकि गन्ना का रकवा थोड़ा कम जरूर हुआ, लेकिन उत्पादन मिल संचालन के लिए कम नहीं था।

वर्ष 2008-09 में शुगर मिल पर बंदी का बोर्ड लगा दिया गया। पैराई बंद होने के दौरान भी गन्ना 4825.449 हेक्टेयर में बोया गया था। राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के प्रांतीय अध्यक्ष दीपक चौधरी बाताते हैं कि बसपा शासन में इसे बंद करा दिया गया। तब से लेकर अब तक इसको चालू कराने के लिए हर बार चुनावी वादे किए जाते हैं। 2014 में चुनाव के दौरान सेंटर खुलवाकर गन्ना खरीदा था:

छाता शुगर मिल के संचालन के लिए संघर्ष से जुड़े राजेश प्रधान ने कहा कि चुनाव आते ही छाता शुगर मिल के मुद्दे को राजनीतिकफायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जीत के बाद इसकी किसी को याद नहीं आती। 2014 में चुनावों के दौरान भी दिखावे के लिए सेंटर चलवाकर गन्ना खरीदा गया और अलीगढ़ भिजवाया गया। इसके बाद अब तक यहां सन्नाटा पसरा है। संचालन हो तो आबाद हो खेती:

गांव ददीगढ़ी निवासी 70 वर्षीय शंकर लाल कहते हैं कि मिल संचालन की अगर ईमानदार कोशिश की जाए तो इलाके में एक बार फिर पहले जैसी ही गन्ना की फसल लहलहा सकती है। मिल ने कभी भी घाटा नहीं दिया। किसान मजबूरी में धान उगा रहा है। मिल चलने से यहां के लोगों को रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।

Posted By: Jagran