बांकेबिहारी को भी चढ़ रहा मिलावटी प्रसाद, रोज चढ़ रहा 200 टन पेड़ा, कहां से आ रहा इतना मावा
वृंदावन के मंदिरों में ठाकुर बांकेबिहारी सहित अन्य देवी-देवताओं को चढ़ाए जाने वाले पेड़े में मिलावट का खुलासा हुआ है। ...और पढ़ें

बांकेबिहारी मंदिर के बाहर हलवाई की दुकान से प्रसाद के लिए पेड़े खरीदता युवक।
विपिन पाराशर, वृंदावन। ठाकुर बांकेबिहारी के दर्शन को आने वाला हर भक्त बड़े भाव के साथ ठाकुरजी को प्रसाद अर्पित करने को बाजार में बिक रहे जिस पेड़ा का उपयोग कर रहा है, उसे ये भी नहीं पता कि ये पेड़ा सिंथेटिक मावा से तैयार किया है।
श्रद्धालु को तो इतना भी नहीं पता होता कि जिस पेड़े को खाने से कोई भी व्यक्ति बीमार पड़ सकता है, उस पेड़े का प्रसाद अपने आराध्य ठाकुर बांकेबिहारी को अर्पित कर रहा है। ये सिलसिला दशकों से चला आ रहा है और खाद्य सुरक्षा विभाग गहरी नींद में सोया है।
एक वर्ष पहले गठित हुई मंदिर उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति ने जब इस मुद्दे को अपनी बैठकों में उठाना शुरू किया तो खाद्य सुरक्षा विभाग ने सेंपलिंग की शुरूआत करके अपनी जिम्मेदारी निभाकर दिखा दी।
बावजूद इसके आज भी बांकेबिहारी मंदिर से लेकर विद्यापीठ चौराहा, इस्काॅन मंदिर, प्रेममंदिर के सामने से लेकर रुक्मिणी विहार मल्टीलेवल पार्किंग तक लगभग दो सौ दुकानों पर सिंथेटिक मावा से तैयार पेड़ा खुलेआम बिक रहा है और यही पेड़ा मंदिरों में ठाकुरजी को प्रसाद के रूप में देश के विभिन्न प्रांतों से आने वाले श्रद्धालु अर्पित कर रहे हैं, भोग लगाकर इस पेड़े को श्रद्धालु घर तक ले जाते हैं।
ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में देश के विभिन्न प्रांतों के श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं, कोसों दूर सफर तय करके आराध्य बांकेबिहारीजी के जब भक्त दर्शन करते हैं तो उनके मन में भाव रहता है कि घर जाने के लिए ठाकुरजी का प्रसाद होना चाहिए। लेकिन, मंदिर प्रबंधन की ओर से भक्तों को घर तक ले जाने को प्रसाद की कोई व्यवस्था नहीं है।
ऐसे में बाहर से आ रहे भक्त मंदिर के आसपास दुकानों से पेड़ा खरीदकर ठाकुरजी को प्रसाद अर्पित करते हैं और सेवायत द्वारा लौटाने पर ठाकुरजी के इस भोग को बड़े भाव के साथ पहले खुद ग्रहण करते हैं और फिर घर तक इसे लेकर जाते हैं और स्वजनों को बांटते हैं।
लेकिन, श्रद्धालुओं को ये भी पता नहीं होता कि जिस पेड़े का प्रसाद वे ठाकुरजी को बड़ी श्रद्धा भाव से अर्पित कर रहे हैं वह इतना दूषित है कि मनुष्यों के खाने के लायक भी नहीं है। मंदिर के आसपास अधिकतर दुकानों में सिंथेटिक मावा से बने पेड़ा की बिक्री खुलेआम हो रही है। ये बात किसी से छिपी भी नहीं है और न ही खाद्य सुरक्षा विभाग से छिपी है।
विभाग आए दिन कई टन पेड़े का मावा छापामार कार्रवाई में पकड़ता है। लेकिन, मंदिरों के आसापास सिंथेटिक मावा के पेड़े की बिक्री पर पाबंदी अब भी नहीं लगी है। ये पेड़ा न केवल ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर बल्कि बांकेबिहारी मंदिर से लेकर इस्काॅन और प्रेममंदिर के सामने मार्केट की अधिकतर दुकानों पर धड़ल्ले से बिक रहा है।
मंदिर उच्चाधिकार प्राप्त प्रबंधन समिति ने बैठक में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों से कई बार इसकी रोकथाम के निर्देश दिए। कई बार सेंपलिंग भी हुई। लेकिन, रोकथाम अब तक नहीं हो सकी है।
हर दिन 200 टन पेड़ा की खपत
वृंदावन में सामान्य दिनों में 200 टन ऐसा पेड़ा बिक रहा है जो सिंथेटिक दूध से तैयार हुआ है। प्रेममंदिर के सामने फड़ लगाकर पेड़ा बेच रहे किशन ने बताया वे राजस्थान के धौलपुर से आने वाला पेड़ा इसलिए खरीदते हैं कि उन्हें 90 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिल जाता है।
इसके लिए उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता और यही पेड़ा दो सौ से तीन सौ रुपये किलो के हिसाब से श्रद्धालुओं को बेचते हैं। बताया कि वृंदावन की दुकानों पर हर दिन लगभग दो सौ टन पेड़ा की खपत है। जबकि जिन दुकानों पर शुद्ध पेड़ा बिकता है, उनकी बिक्री कम इसलिए है कि उनके दाम अधिक हैं।
एक किलो पेड़ा तैयार करने में लगते हैं साढ़े चार सौ रुपये
पत्थरपुरा पर मिठाई विक्रेता श्याम गुप्ता ने बताया शुद्ध पेड़ा बनाने के लिए चार किलो दूध की जरूरत होती है, जिसकी कीमत 280 रुपये हुई। इसके बाद इसका मावा तैयार करते हैं, इसमें रसोई गैस सिलेंडर की कीमत, शक्खर अथवा बूरा भी इसमें मिलाया जाता है। घंटों में मावा तैयार होता है।
मावा तैयारी से लेकर पेड़ा बनाने तक में कारीगर की मेहनत लगातर एक किलो पेड़ा लगभग साढ़े चार सौ रुपये किलो का दुकदानदार को पड़ता है। ऐसे में बाजार में दो सौ से तीन सौ रुपये किलाे पेड़ा बिकेगा तो किस स्तर का होगा, ये जांच करने वाली बात है।
