जागरण संवाददाता, मथुरा (वृंदावन): हाथ में 'इकतारा, डुग्गी एवं पारंपरिक वाद्य यंत्र। अद्भुत रोशनी से नहाए कुसुम सरोवर की लहरों के बीच तैरते मंच पर जब प्रख्यात बाउल नृत्यांगना पार्वती बाउल अपने हुनर का प्रदर्शन करेंगी, तो नाम संकीर्तन अपने चरम पर दिखाई देगा। वृंदावन प्रकाश महोत्सव में अपनी अदाकारी से वे दुनिया भर के चैतन्य भक्तों को अचंभित करती नजर आएंगी।

गर्दन में पुष्प माला और पैर पर खनक नूपुर पायल के साथ कुमकुम लगाए रूप में गेरुआ वस्त्र पहने वह हरि कीर्तन (भक्ति गीत) का प्रदर्शन करेंगी। पार्वती बाउल नृत्य में 'राधा प्यारी नामक सूफी संगीत पर अपना नृत्य प्रस्तुत करेंगी, जिसमें भगवान कृष्ण अपनी प्रेयसी राधा के साथ होली खेलते हैं। नृत्यांगना पार्वती के लिए बाउल गायन उसके जीवन में बसा नजर आता है। बाउल नृत्य वह शैली है, जिसमें गायन, नृत्य और संकीर्तन सभी सही सामंजस्य में एक ही समय में उपकरणों से खेलने जैसा प्रतीत होता है। बाउल के जादू के बारे में बताया जाता है कि यह गति में ध्यान की साधना है।

ये है बाउल संगीत

रचनात्मक, प्रेम, भक्ति और शांति के बारे में बात करने के लिए बाउल, संगीत की तुलना में एक अधिक उपयुक्त माध्यम है। इस ऐतिहासिक लोक परंपरा की पहचान अक्सर विशिष्ट कपड़े और संगीत के वाद्ययंत्र से ही होती है। बंगाली जनसंख्या के छोटे से अनुपात में बाउल संगीतज्ञ शामिल हैं, जबकि बाउल में गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की कविता और संगीत का काफी प्रभाव देखा जाता है।