जासं, मैनपुरी: पर्यूषण पर्व के सातवें दिन शहर के मुहल्ला कटरा स्थित अजितनाथ जिनालय में आचार्य प्रमुख सागर महाराज की शिष्या प्रतिज्ञा, परीक्षा और प्रेक्षा माताजी के सानिध्य में दशलक्षण महामंडल विधान के अंतर्गत उत्तम तप धर्म के विधान का आयोजन किया गया। प्रवचन के दौरान ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होना बताया।

गुरुवार के विधान का सौभाग्य सौधर्म इंद्र इंद्राणी शांति सरन जैन परिवार को मिला। प्रतिज्ञा माताजी ने उत्तम तप धर्म पर बोलते हुए कहा कि कर्म क्षय के लिए जो तपा जाता है उसका नाम है तप। तप के बिना कभी भी ध्यान नहीं होता है और ज्ञान के बिना कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती है। तप का फल ध्यान है और ध्यान का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल मुक्ति है और मुक्ति का फल सुख है अनंत सुख। उन्होंने कहा कि तप के बिना संयम अधूरा है, बिना तप के ध्यान नहीं हो सकता। ध्यान तो तप का फल है, कुंवासनाओं के संस्कार से मन को परमुक्त हो जाने का नाम ही तो तप है।

सायंकालीन कार्यक्रम में गुरु भक्ति और आरती की गई, जिसमें समाज के लोगों ने दीप अर्ध समर्पित किए। कार्यक्रम सफल बनाने के लिए प्रमुख सागर, युवा मंच, सचि महिला मंडल, पुष्प प्रमुख चातुर्मास समिति का सहयोग रहा। संचालन डा. सौरभ जैन ने किया। साधन नहीं, साधना का मार्ग है तप: विहसंत सागर

संसू, करहल : कस्बा के जैन मंदिर नसिया में जैन मुनि विहसंत सागर महाराज ने दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन गुरुवार को तप धर्म के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में कोई न कोई तपस्या अवश्य करनी पड़ती है।

जैन मुनि ने बताया कि तपस्या दो प्रकार की होती है। एक तपस्या संसार का भोग कराती है, आत्मा की तपस्या परमार्थ की ओर ले जाती है। तप साधना का मार्ग है, साधनों का मार्ग नहीं होता है। जो एक बार साधना सह लेता है, वह तपस्वी बन जाता है। सोना भी तपने के बाद कुंदन बनता है। उसी तरह ये आत्मा भी तपने के बाद ही परमात्मा बनती है।

मेडिटेशन गुरु ने कहा कि मक्खन को तपाने के बाद ही उसमें से शुद्ध घी निकलता है, फिर घी से दोबारा दूध कभी नहीं बन सकता। वैसे ही शुद्ध आत्मा परमात्मा बन जाती है तो परमात्मा बनने के बाद दोबारा आत्मा नहीं बनती है। सुबह के समय श्रीजी का अभिषेक और शांतिधारा का जैन मुनि के सानिध्य में विमल जैन, सौरभ जैन ने सौभाग्य प्राप्त किया।

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