जासं, मैनपुरी : लगातार पांचवें साल स्वच्छता का सिरमौर बने इंदौर ने छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया। स्वच्छता सर्वेक्षण में सिर्फ कूड़ा निस्तारण को ही शामिल नहीं किया बल्कि बहाऊ गंदगी के निस्तारण पर भी काम किया। कार्यदायी संस्था ने वहां स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिलकर शहर के छोटे-बडे़ सभी नालों को ढकवाने के प्रबंध कराए। सीमेंट की स्लैब बनवाकर नालों को बंद करा गंदगी और मच्छरों पर काबू पा लिया। जो नाले ढके, उनके स्लैब के ऊपर ही हथठेल वालों को स्थान दे दिया, ताकि फुटपाथों पर व्यवस्था बनी रहे। बात मैनपुरी की करें तो यहां सकारात्मक सोच बन ही नहीं पाई। नालों को ढकवाए जाने को लेकर बातें तो कई बार हुईं, लेकिन पालिका प्रशासन द्वारा हमेशा इसे अनदेखा कर दिया गया। शहर में छोटे-बडे़ मिलाकर लगभग पांच सैकड़ा से नाले हैं। इनमें से एकाध को छोड़कर बाकी किसी भी नाले पर स्लैब नहीं रखवाई गई हैं। सारे नाले खुले पडे़ हैं।

खुले नालों से ये है समस्या

दुकानदारों या सामान्य लोगों द्वारा अपनी दुकानों या घरों के आसपास झाडू लगाकर निकलने वाले कचरे को सीधे नालों में ही डाल दिया जाता है। धीरे-धीरे कचरा बढ़ने के कारण नाले जाम हो जाते हैं जिससे पानी का बहाव रुक जाता है। पानी का जमाव होने पर मच्छर पनपने लगते हैं जो बीमारियों की वजह बन रहे हैं। इतना ही नहीं, रास्ते से गुजरने वाले राहगीरों को गंदगी सड़ने से दुर्गंध का सामना करना पड़ता है।

कुछ ऐसे बदल सकते हैं शहर की सूरत

नालों को ढककर शहर की सूरत को बदला जा सकता है। यदि नालों को स्लैब के जरिए ढकवा दिया जाता है तो उसमें कचरा जाना बंद हो जाएगा। जिससे पानी का ठहराव नहीं होगा और मच्छर नहीं पनपेंगे। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पालिका प्रशासन को हर साल नालों की सिल्ट सफाई के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने की जरूरत नहीं होगी। सामान्य कर्मचारियों द्वारा आसानी से कचरे को निकाल लिया जाएगा। नाले ढक जाने के बाद उन पर स्थान निर्धारित कर हथठेल वालों को स्थान दे दिया जाए ताकि फुटपाथ इनके कब्जे से मुक्त हो सकें। कुछ स्थानों पर नालों के किनारे फुलवारी उगाकर भी शहर को खूबसूरत दिखाया जा सकता है।

स्वच्छता के प्रहरी

शहर की आवास विकास कालोनी निवासी समाजसेवी आराधना गुप्ता स्वच्छता के लिए लंबे समय से प्रयासरत हैं। अपने एनजीओ की सदस्य महिलाओं के साथ मिलकर पार्कों की स्थिति बेहतर करने के लिए कई बार प्रयास किए। जिला अस्पताल और 100 शैया अस्पताल में पौधरोपण करा उन पौधों की देखरेख का जिम्मा भी उठा रही हैं। उनका कहना है कि यदि हम महिलाएं स्वच्छता के प्रति जागरूक हो जाएं तो शहर की सूरत भी बदल सकती हैं। इसके लिए जरूरी है कि कचरे को सार्वजनिक स्थानों पर फेंकने की बजाय डस्टबिन में ही डालें। कालोनी में भी बैठकों के जरिए वे अक्सर महिलाओं से स्वच्छता रखने की अपील करती हैं।

Edited By: Jagran