छोटी सी झोपड़ी से निकलकर कैसे यूपी में लोगों की फेवरेट बनी मैनपुरी की सोहन पापड़ी? दिलचस्प है कहानी
मैनपुरी की सोहन पापड़ी, जो 90 साल पहले एक झोपड़ी से शुरू हुई थी, अब जिले की पहचान बन गई है।

दुकान के काउंटर पर सजी सोहन पापड़ी
HighLights
मैनपुरी की सोहन पापड़ी 90 साल पुरानी विरासत।
'एक जिला, एक व्यंजन' में मिली विशेष पहचान।
झोपड़ी से शुरू होकर प्रदेश तक पहुंची मिठास।
जागरण संवाददाता, मैनपुरी। मैनपुरी की पहचान सिर्फ क्रांतिकारी इतिहास, साहित्य और माटी से ही नहीं है। यहां की मिठास भी दूर तक अपनी पहचान बना रही है। फिर बात जब सोहन पापड़ी की हो, तो स्वाद की ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसका नाम लेते ही मुंह में मिठास घुलने लगती है।
महीन रेशों जैसी बनावट, घी की खुशबू और मुंह में जाते ही घुल जाने वाला स्वाद इसे अन्य मिठाइयों से अलग और खास पहचान देता है। यही कारण है कि नौ दशक पहले झोपड़ी के नीचे शुरू हुआ मिठास बांटने का सफर आज जिले की सीमाओं को लांघ प्रदेश तक पहुंच गया है।
स्वादिष्ट और मनभावन सोहन पापड़ी को प्रदेश सरकार द्वारा 'एक जिला, एक व्यंजन' में मैनपुरी के अनोखे स्वाद के रूप में शामिल किया गया है। भले जिले में मिठास की पहचान बनी हो, लेकिन इसके बनने तक की कहानी 90 वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है।
पीली मिठाई के नाम से जानी जाती थी सोहन पापड़ी
1936 से पहले शहर के सराफा बाजार में छप्पर की झोपड़ी से इसका निर्माण और बिक्री की शुरुआत हुई। गांव से मटकों में लाने वाले शुद्ध देशी घी, बेसन और मैदा के मिश्रण से तैयार वर्तमान सोहन पापड़ी तब पीली मिठाई के नाम से बिकती थी। पीढ़ियां बदलीं, स्वाद की पसंद बदली, बाजार का रंग भी बदला, लेकिन मिठाई की लोकप्रियता लगातार बढ़ती चली गई। अब इसे एक जिला, एक व्यंजन में भी स्थान मिल चुका है।
मैनपुरी आने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने सोहन पापड़ी का स्वाद न चखा हो। बाहर से आने वाले लोगों के लिए यह मिठाई सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि मैनपुरी की यादों को साथ ले जाने का माध्यम भी बन गई है। किसी के हाथ में पैकेट बनकर यह रिश्तेदारों तक पहुंचती है तो किसी के सफर की मिठास बनकर दूसरे शहर जाती है।
90 वर्ष की यह यात्रा बताती है कि किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों और इतिहास से नहीं बनती, बल्कि उन स्वाद से भी बनती है, जिन्हें पीढ़ियां अपने साथ आगे ले जाती हैं। सोहन पापड़ी भी ऐसी ही मिठास है - जिसमें घुला है हुनर, परंपरा, अपनी मिट्टी की खुशबू और बुजुर्गों की दी हुई रेसिपी।
