जागरण संवाददाता, मैनपुरी : रमजान के मुबारक दिनों में नेकदिली का सिलसिला बदस्तूर जारी है। खुदा के दरबार में अपनी अर्जी लगा रोजेदार अमनपसंद लोगों को इंसानियत का पाठ पढ़ा रहे हैं। कोई ¨जदगी की हकीकत से रूबरू कराता फिरता है तो कोई ¨जदगी को दुआओं से महफूज रख मजबूरों का रहनुमा बनने के ख्वाब संजो रहा है। रब की रहमत पर भरोसा रखने वाले रोजेदारों की दुआओं से ही रोशन हो रही है है कई मजबूरों की दुनियां।

शहर के मुहल्ला सौतियाना में रहने वाले गुलाम हुसैन (40) इबादत पर विश्वास करते हैं। खुद की ¨जदगी मेहनत के बूते गुजर रही है लेकिन दूसरों की दुनिया आबाद रखने की इनकी कोशिश कभी कम नहीं होती। खुद के खाने को निवाला भले न मिले, लेकिन रोटी के लिए दरवाजे पर आने पर किसी गरीब को कभी भूखा नहीं लौटाते। गरीबों के हिस्से का एक निवाला अलग रखने का उनका यह सिलसिला वर्षों पुराना है। वह कहते हैं कि इस दुनिया में लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती है। वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जिनके लिए खाना सिर्फ स्वाद का एक जरिया होता है। अगर, हम सभी खाना बर्बाद करने की बजाय उसकी अहमियत समझें तो लाखों गरीब भूखे लोगों को दो वक्त का भरपेट खाना मुहैया करा सकते हैं। लेकिन, हम तभी दूसरों से बदलने की गुजारिश कर सकते हैं जब पहले खुद बदलें। बस, खुदा का हुक्म मान वर्षों से मजलूमों और भूखे लोगों की रोटी जुगाड़ने की फिक्र उन्हें अल्लाह के करीब ले आती है।

मुहल्ले में रहने वाले अदनान वारसी (10) अपनी उम्र के दूसरे लड़कों की ही तरह हैं। लेकिन, समाज को देखने का उनका नजरिया जुदा है। छोटी उम्र में पांच वक्त की नमाज और पूरे 30 दिनों के रोजा रखना वह अपना फर्ज समझते हैं। अपनी उम्र के दूसरे लड़कों को अदनान पानी की अहमियत समझाते फिरते हैं। वह कहते हैं धरती पर पानी तो बहुत है लेकिन पीने लायक बहुत कम है। यह जानते हुए भी हम पानी बर्बाद करते हैं। खुदा ने हमें पानी देकर अपनी दुआ दी है। यह हमारा ही काम है कि हम इसकी हिफाजत करें। वह जहां कभी भी पानी फैलता हुआ देखते हैं, खुद ही आगे बढ़कर उसे बंद करने में जुट जाते हैं। नमाज के लिए जाते वक्त भी अपने बड़ों से पानी बचाने के लिए ही बातें करते फिरते हैं। उनकी आदत अब चर्चा का विषय बनती जा रही है।

Posted By: Jagran

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