जासं, महोबा: वीरभूमि के गोरखगिरि मुख्य द्वार पर विशाल शिला में उत्कीर्ण तांडव की प्रतिमा अदभुत है। उतना ही अदभुत उसका इतिहास है। यह मूर्ति उत्तर भारत में अपने किस्म की अनोखी है। इसका वर्णन कर्मपुराण में भी मिलता है। इतिहासकारों के मुताबिक ऐसी प्रतिमा दक्षिण भारत में ऐलोरा, हेलविका तथा दारापुरम में भी है।

इतिहास :

बताते हैं कि 11वीं शताब्दी में चंदेल शासक नान्नुक ने महत्ता को जाना तो गोरखगिरि पर्वत के पास भगवान शिव की तांडव करती महाकाल रूपी सिद्ध प्रतिमा स्थापित कराई। इतिहासकार बताते हैं कि भगवान शिव ने गजांतक नामक असुर का वध करने के बाद यहां नृत्य किया था। चंदेल शासक नान्नुक ने ऐतिहासिक मदनसागर सरोवर के पश्चिम में गोरखगिरि पर्वत की उत्तर क्षेत्र में शिला पर भगवान भोलेनाथ की महाकाल की मुद्रा में तांडव नृत्य करती दस भुजी प्रतिमा का निर्माण कराया था।

महत्व :

सावन के हर सोमवार को शिवभक्तों का मजमा जुटता है। मान्यता है कि यहां मत्था टेकने वाले श्रद्धालु की हर मनोकामना पूरी होती है। महाशिवरात्रि, मकर संक्रांति और सावन मास के सभी सोमवार को यहां विशेष पूजन होता है।

कैसे पहुंचे मंदिर

गोरखगिरि पर्वत महोबा शहर से तीन किमी दूर है। यहां श्रद्धालु बस से या फिर ट्रेन से आ सकते हैं। बस से आने पर महोबा से टेंपो, आटो मंदिर तक पहुंचा देते हैं। निजी वाहन से शिवतांडव मंदिर तक आसानी से जा सकते हैं।

मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है, यहां पूरे साल श्रद्धालुओं का दर्शन पूजन का क्रम बना रहता है, काफी दूर-दूर से लोग आते हैं, गोरखगिरि के मुख्य गेट के पास होने से इनका और भी महत्व हो जाता है।

- चंद्रिका उपाध्याय, पुजारी, बड़ी चंद्रिका देवी मंदिर

दशकों पहले मंदिर तक पहुंचने का रास्ता सुगम नहीं था, अब तो सड़क मार्ग हो जाने से आसपास और मंदिर परिसर में चहल पहल रहती है। कभी घनघोर जंगल होने से वहां हर कोई जाने शाम होने के बाद जाने से डरता था।

- दिनेश पांडेय, पुजारी, छोटी चंद्रिका मंदिर

Edited By: Jagran