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महोबा, कार्यालय प्रतिनिधि : ढोल-नगाड़े की टंकार के साथ पैरों में घुंघरू, कमर में पट्टा और हाथों में लाठियां ले बुंदेले जब इशारा होते ही जोशीले अंदाज में एक-दूसरे पर लाठी से प्रहार करते है, तो यह नजारा देख लोगों का दिल दहल जाता है। इस हैरतंगेज कारनामे को देखने के लिए लोगों का भारी हुजूम उमड़ता है। सभी को आश्चर्य होता है कि ताबड़तोड़ लाठियां बरसने के बाद भी किसी को तनिक भी चोट नहीं आती। बुंदेलखंड की यह अनूठी लोक विधा मार्शल आर्ट से किसी मायने में कम नहीं है।

बुंदेलखंड का दीवारी नृत्य बुंदेलों के शौर्य एवं वीरता का प्रतीक है। इतिहासकारों का मानना है कि चंदेल शासन काल में शुरू हुई इस अनूठी लोक विधा का मकसद था कि घर-घर में वीर सपूत तैयार किए जा सके और वह बुराई व दुश्मनों के खिलाफ लड़ सकें। प्रकाश पर्व दीपावली के कुछ दिन पहले से ही गांव-गांव में लोग टोलियां बना दीवारी खेलने का अभ्यास करने लगते है। जो भाई बहन के प्यार के पर्व भैया दूज के दिन खत्म होता है। इसके बाद दोहों व लोकगीतों के साथ दीवारी नृत्य की शुरूआत होती है। कार्तिक के पवित्र माह में हर तरफ इस लोक विधा की धूम मची हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसका खासा प्रचलन है। बुंदेले अलग-अलग टोलियां बना हाथों में लाठियां ले करतब दिखाते है तो इसे देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग एकत्र होते है। नगाडे़ की टंकार के साथ दीवारी खेलने वालों की भुजाएं भी फड़कने लगती है। लाठियों की गूंज व बुंदेलों के करतब देख लोगों के दिल दहल जाते है। सभी दंग रह जाते है कि लाठियों के इतने प्रहार के बाद भी किसी को खरोंच तक नहीं आयी। अनूठा खेल दिखाने के बाद टोली में शामिल लोग हाथों में मोर पंख लेकर लोकगीतों व कृष्ण की भक्ति में थिरकने लगते है, जिसे देख मौजूद लोग भी झूम उठते है।

बुजुर्गो के साथ बच्चे भी दिखाते हैं हुनर

दीवारी नृत्य बुंदेली संस्कृति का अभिन्न अंग है। छिकहरा के वंश गोपाल व भंडरा गांव के मानसिंह का मानना है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया था तब इसकी खुशी में ग्वालवालों ने हाथों में लाठियां ले नृत्य किया था। वह बताते है कि दीपावली के कुछ दिन पहले से ही ग्रामीण अंचलों में लोगों द्वारा टोलियां बना इसका अभ्यास शुरू कर दिया जाता है। जिसमें बड़े बूढ़ों के साथ बच्चे भी लाठियां ले अपने कला-कौशल का प्रदर्शन करते है।

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