महराजगंज: पड़ोसी मुल्क नेपाल के भैरहवा में आध्यात्मिक जागृति विराट एकता धर्म सभा के आयोजन में हिदूधर्म की महत्ता व नेपाल को पुन: हिदू राष्ट्र बनाने को लेकर चर्चा हुई। इस दौरान धर्म सभा में शामिल होने आए गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चानंद सरस्वती का भव्य स्वागत किया गया।

बतौर मुख्य वक्ता धर्मसभा को संबोधित करते हुए शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि भारत तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब तक नेपाल सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि नेपाल पर नजर रखने वाले चीन से अगर नेपाल असुरक्षित है, तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का मूल धर्म सनातन धर्म है। यहां के कम्युनिस्ट भी हिदू राष्ट्र पर सहमत थे , लेकिन बाहर से इसके बारे में खुलकर बात नहीं कर सकते थे। शंकराचार्य ने कहा था कि कम्युनिस्ट बाहर से नास्तिक होते हुए भी अंदर से आस्तिक हैं। कोई भी व्यक्ति या वस्तु एक क्षण के लिए भी धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकती। इसलिए धर्मनिरपेक्षता केवल एक शब्द है और इसका कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने सनातन धर्म के उत्थान के लिए सभी से काम करने का आग्रह किया। फेडरेशन आफ नेपाली चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री लुंबिनी के प्रदेश अध्यक्ष व आयोजक कर्ता कृष्ण प्रसाद शर्मा ने कहा कि यह आयोजन किसी राजनीतिक जुड़ाव से नहीं , बल्कि नेपाल को हिदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से किया गया है।

श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु

महराजगंज: घुघली विकास खंड के पचरुखिया तिवारी में आयोजित भागवत कथा में सोमवार को आचार्य पंडित उपेंद्र तिवारी ने कृष्ण जन्म की कथा सुनाई, जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण की मनमोहक झांकियां भी सजाई गई थीं। आचार्य पं. उपेंद्र तिवारी ने बताया कि जब पृथ्वी अधर्म के बोझ तले दबकर भगवान से रक्षा की गुहार लगाती है, तब-तब भगवान अवतार लेकर पृथ्वी से दुष्टों का नाश करते हैं जब भगवान कुछ बड़े हो गए तो उन्होंने मथुरा के दुराचारी राजा कंस का वध कर जेल में बंद कर अपने माता-पिता को मुक्त कराया। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए पांडवों का साथ देकर कौरवों का विनाश कराया।

आचार्य ने बताया कि कौरव ने भगवान कृष्ण से अक्षुणी सेना मांगी और अर्जुन ने सिर्फ भगवान कृष्ण को मांगा था, लेकिन अर्जुन धर्म की लड़ाई लड़ रहे थे। इसलिए भगवान ने अर्जुन का साथ देते हुए पूरे कौरव वंश का विनाश कर दिया और पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की। कथा की यजमान कोदई तिवारी और उनकी पत्नी सुधा तिवारी रहीं। पंडित जगदीश दुबे, दीपू तिवारी, बालमुकुंद तिवारी, शुभम तिवारी, राज तिवारी, नीरज श्रीवास्तव, शैलेष तिवारी, राजमन तिवारी, राम तिवारी, राजेश तिवारी, श्रीराम, मैनू तिवारी, छवींद्र तिवारी, रोहन तिवारी आदि मौजूद रहे।

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