'फेरि बनाउंछौं... सब ठीक हुन्छ' बाढ़ ले गई घर, हौसला नहीं, नुवाकोट में टूटी दीवारों के बीच लिखा जा रहा उम्मीद का नया अध्याय
बाढ़ से तबाह नुवाकोट में लोग अपने घरों और दुकानों से मलबा हटाकर जिंदगी फिर से संवारने में जुटे हैं। ...और पढ़ें

गलछी में आई बाढ़ विभीषिका में तबाही। अभिनव राजन चतुर्वेदी।
HighLights
बाढ़ प्रभावित नुवाकोट में लोग स्वयं सफाई और पुनर्निर्माण में जुटे।
सरकारी मदद की कमी के बावजूद, हौसला नहीं टूटा।
"फेरि बनाउंछौं... सब ठीक हुन्छ" की भावना से प्रेरित।
रजनीश त्रिपाठी, नुवाकोट (नेपाल)। पानी उतर गया है, लेकिन घरों के भीतर और आंगन में जमा गाद अब भी बाढ़ की ऊंचाई बता रही है। कहीं दीवारें आधी खड़ी हैं तो कहीं कमरों की जगह मलबा है। सड़क किनारे गृहस्थी का सामान बिखरा है। इसी मलबे के बीच लोग अपने हाथों से उजड़ी जिंदगी का एक-एक हिस्सा तलाश रहे हैं। कोई फावड़े से घर की गाद निकाल रहा है, कोई टूटी दीवार के आसपास मलबा हटा रहा है तो कोई अपनी दुकान के भीतर जमी मिट्टी को बाहर फेंक रहा है।
राहत का इंतजार है, लेकिन इंतजार में जिंदगी थमी नहीं है। लक्ष्मी श्रेष्ठ भी मलबे के बीच काम में लगी हैं। उनके सामने घर फिर खड़ा करने का सवाल है और पीछे बाढ़ में उजड़ चुके दिनों की तस्वीर। वह कहती हैं, फेरि बनाउंछौं... सब ठीक हुन्छ यानी फिर बनाएंगे, सब ठीक होगा। आवाज में दर्द है, लेकिन हार नहीं। वह जानती हैं कि राहत से आज का संकट टल सकता है, मगर कल घर चलाने के लिए फिर काम चाहिए।
मलबे में गाद से सनी एलईडी टीवी निकालते हुए टेक नारायण कुछ पल के लिए रुक जाते हैं। टीवी को देखते हुए कहते हैं, घटना से पहले बच्चे इसमें कार्टून देख रहे थे। कल तक बच्चों की आवाज से भरा कमरा आज गाद से अटा है। टीवी बच पाएगा या नहीं, यह भी पता नहीं, लेकिन घर की सफाई रोकने का सवाल नहीं है। जो बच सकता है उसे बचाना है और जो नहीं बचा, उसकी जगह फिर कुछ खड़ा करना है।

विष्णु कुमार भी अपने घर के मलबे को हटाने में जुटे हैं। जिस जगह खड़े होकर वह बात कर रहे हैं, उसके नीचे एक पूरा तल दबा हुआ है। वह मलबे की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, जहां आप खड़े हैं, उसके नीचे एक मंजिल का मकान दबा है। अभी तो तीसरी मंजिल साफ कर रहे हैं। काम कितना बड़ा है, इसका अंदाजा मलबे के ढेर से लगाया जा सकता है। फिर भी उनके कदम रुके नहीं हैं। कहते हैं, भगवान ने उजाड़ा है, वही बसाएंगे।

पास ही चोक बहादुर दहाल अपनी किराना दुकान से गाद निकालते-निकालते थककर बाहर खड़े हैं। कपड़ों पर मिट्टी है, दुकान के भीतर सामान की जगह गाद पसरी है। कुछ देर सांस लेने के बाद वह फिर सफाई में जुट जाते हैं। उनकी शिकायत है, सरकार से मदद नहीं मिल रही है। पुलिस, सेना अभी हमारी मदद नहीं कर रही। लेकिन, दुकान छोड़कर बैठ जाने का विकल्प भी उनके पास नहीं है। गाद निकलेगी, तभी दुकान साफ होगी, दुकान खुलेगी, तभी फिर कमाई शुरू होगी।

गल्छी की तबाही के बीच यही दृश्य बार-बार सामने आ रहा है। बाढ़ ने घरों की दीवारें गिराईं, गृहस्थी को गाद में दबाया, दुकानों को बंद किया और कमाई रोक दी, लेकिन लोगों के हाथों से काम करने की ताकत नहीं छीनी। किसी के हाथ में फावड़ा है, किसी के हाथ में टूटा सामान, कोई दीवार के पास जमा मलबा हटा रहा है तो कोई अपनी दुकान को फिर खड़ा करने की तैयारी में है। उनके सामने आज का नुकसान बहुत बड़ा है, कल का रास्ता अनिश्चित है, फिर भी एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है। फेरि बनाउंछौं... सब ठीक हुन्छ। उजड़े घरों के बीच यही भरोसा बता रहा है कि बाढ़ ने इन लोगों की दुनिया तोड़ दी है, लेकिन उसे दोबारा बनाने की जिद अब उन्हीं हाथों में है।
