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त्रिशूली की बाढ़ में बहे अपने: 12 साल चलेगा पहचान का इंतजार, स्टील प्लेटों में दफ्न उम्मीदें

By Vishwadeepak TripathiEdited By: Vivek Shukla
Published: Wed, 02 Sep 2026 07:56 AM (IST)

नेपाल बाढ़ त्रासदी में मिले अज्ञात शवों की पहचान के लिए 12 साल लंबी प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जिसमें ...और पढ़ें

धांदिग जिले के गजुरी में मिट्टी में संरक्षित शवों के ऊपर लगाया गया टैग। जागरण

धांदिग जिले के गजुरी में मिट्टी में संरक्षित शवों के ऊपर लगाया गया टैग। जागरण

HighLights

  1. अज्ञात शवों की पहचान के लिए 12 साल की लंबी प्रक्रिया।

  2. डीएनए मिलान और कपड़ों से होगी बाढ़ पीड़ितों की पहचान।

  3. फोरेंसिक विशेषज्ञों की कमी, शवों का सुरक्षित संरक्षण चुनौती।

विश्वदीपक त्रिपाठी, नुवाकोट (नेपाल)। प्रहरी कार्यालयों में रखी स्कूली बच्चों की टाई, बेल्ट और ड्रेस। दीवार पर टंगी हैं कुछ तस्वीरें- किसी के हाथ पर बना टैटू, किसी के क्षतिग्रस्त चेहरे की फोटो, किसी की कलाई पर घड़ी बंधी है। ये कपड़े और निशान अंतिम उम्मीद हैं, जिनके जरिए त्रिशूली की बाढ़ में बह गए अपनों को उनके स्वजन तक पहुंचाने की आखिरी कोशिश जारी है। यह प्रक्रिया 12 साल चलेगी।

रसुवा से आई विनाशकारी बाढ़ में अब तक 961 शव मिल चुके हैं। कई ऐसे हैं जिनकी पहचान संभव नहीं है। नेपाल पुलिस ने डीवीआइ (डिजास्टर विक्टिम आइडेंटिफिकेशन) प्रोटोकाल लागू किया है। गजुरी गांवपालिका में बने अस्थायी शव गृह में हर शव के ऊपर स्टील की प्लेट लगाकर नंबरिंग की जा रही है। शव को चार फीट नीचे जमीन में दफनाकर ऊपर एक बोर्ड लगाया गया है, जिस पर नंबर, कपड़े, टैटू और बरामदगी स्थल का विवरण लिखा है।

शुरुआत में सरकार ने शवों को दफनाना शुरू किया तो अपने ही देश में आलोचना झेलनी पड़ी कि विधिविधान से अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जा रहा। इस पर बालेन सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि सुरक्षित संरक्षण है। 12 साल तक जब भी इनके स्वजन आएंगे, डीएनए मिलान के बाद शव के अवशेष उन्हें सौंप दिए जाएंगे।

सबसे बड़ी चुनौती फोरेंसिक नमूना एकत्र करने की है। इतनी बड़ी संख्या में शवों के लिए नेपाल में फोरेंसिक विशेषज्ञों की कमी पड़ गई है। शवों को सुरक्षित कराने के लिए काठमांडू से धादिंग के गजुरी आए फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. राजकुमार कार्की ने बताया, त्रासदी की भयावहता के हिसाब से नेपाल में फोरेंसिक विशेषज्ञ कम पड़ गए हैं। रसुवा, धादिंग, नुवाकोट जहां भी सूचना मिल रही है, बुलाया जा रहा है। जहां जा रहे हैं, शवों को सुरक्षित करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं।''

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गजुरी के डीएसपी सूरज कार्की बताते हैं कि अब तक यहां से 57 शवों को त्रिशूली से निकाला जा चुका है। शव के साथ जेब से मिले सामान को पैक कर उसी नंबर से टैग किया जा रहा है। शवों की पहचान उनके कपड़े से करने का प्रयास है। इससे पहले टिमुरे के एक स्कूल के तीन बच्चों की पहचान उनकी टाई पर लगे लोगों से हुई थी।

स्टील की प्लेट पर लिखा नंबर और प्रहरी कार्यालयों में रखी टाई-बेल्ट, 12 साल तक किसी अपने के आने का इंतजार करेंगे।

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