आनन्दनगर, (महराजगंज):

तराई के इस जनपद में आधी आबादी के लिए पिछले चार दशक से जम्हूरियत का रंग गाढ़ा नहीं हो सका है। इनकी दुनिया चौखट के भीतर ही सिमटती जा रही है। सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में पीडि़तों की आवाज को बुलंद करने के लिए महिला प्रतिनिधि लम्बे अर्सें से नहीं पहुंच पायीं हैं। राजनैतिक दलों द्वारा कभी कभार चुनावी बिसात पर राजनैतिक फायदे के लिए महिलाओं को टिकट भी दिया गया। लेकिन, महिला प्रत्याशी के सिर जीत का सेहरा न बंधने से घूंघट की ओट से निकल कर चुनावी समर में कूदने वाले उम्मीदवारों की संख्या अब दिनों दिन कम होती जा रही है।

आंकड़ों पर गौर करें तो 1969 में स्वतंत्रता संग्रमा सेनानी व फरेन्दा से तीन बार विधायक रहे गौरी राम गुप्ता की पत्नी पियारी देवी फरेन्दा से विधायक चुनी गई। पियारी देवी तत्कालीन गोरखपुर जनपद (अब महराजगंज) की पहली महिला विधायक बनी थीं। उस समय जनपद की पंद्रह सीटों में से फरेन्दा की एक मात्र सीट ही किसी महिला के खाते में गई थी। पियारी देवी ने कद्दावर नेता शिब्बन लाल सक्सेना को शिकस्त देकर विजयी हुई। चुनाव के समय पियारी देवी के राजनैतिक विरोधी नारा लगाया करते थे कि वोटवा दे दीह कुकुरे बिलारी के,लेकिन न दीह पियारी के.। विरोधियों के लाख घेराबंदी के बाद भी पियारी देवी को यहां की जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना। पियारी देवी के बाद फरेन्दा सहित जनपद की किसी भी विधान सभा सीट से अब तक किसी भी महिला उम्मीदवार के सिर जीत का सेहरा नहीं बंध सका है। विधान सभा चुनाव के लिए सांसद हर्षवर्धन की पत्‍‌नी श्रीमती विष्णु सिंह, कांग्रेस नेत्री तलत अजीज सहित अन्य महिला प्रत्याशियों ने समय समय पर भाग्य भी अजमाया। लेकिन, सफलता किसी को भी नहीं मिली। लम्बे अर्से से इन जनपद के महिला उम्मीदवारों के विधान सभा न पहुंचे से आधी आबादी की पीड़ा घर के अंदर ही सिमटी रह जा रही है।

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