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'न आगे जा सकते हैं, न घर लौट सकते हैं...', नेपाल के पहाड़ों में उम्मीद की राह तक रहे बुजुर्ग और बच्चे

By Rajnish TripathiEdited By: Vivek Shukla
Published: Mon, 31 Aug 2026 04:01 PM (IST)Updated: Mon, 31 Aug 2026 09:32 PM (IST)

नेपाल के धादिंग में कृष्णाभीर में सड़क बह जाने के कारण राजस्थान के कोटा और बारा से आए 60 तीर्थयात्री ...और पढ़ें

नेपाल के गजुरी गांव पालिका में फंसे भारतीय पर्यटक। अभिनव राजन चतुर्वेदी

नेपाल के गजुरी गांव पालिका में फंसे भारतीय पर्यटक। अभिनव राजन चतुर्वेदी

HighLights

  1. कृष्णाभीर में सड़क बहने से 60 तीर्थयात्री फंसे।

  2. धादिंग के गजुरी में 15 दिन तक रास्ता बंद।

  3. भोजन, आवास की समस्या, बुजुर्गों-बच्चों की चिंता।

रजनीश त्रिपाठी,  धादिंग (नेपाल)। आंखों के सामने सड़क खत्म हो गई है और उसके साथ ही इन तीर्थयात्रियों की आगे की राह भी। काठमांडू से करीब 65 किलोमीटर दूर कृष्णभीर में रास्ता कट जाने से राजस्थान के कोटा और बारा से आया तीर्थयात्रियों का समूह अपनी बस के साथ फंस गया है। बस आगे नहीं जा सकती और पीछे लौटना भी आसान नहीं। राशन खत्म होने को है। रात में ठहरने के लिए कोई जगह नहीं मिल रही।

सड़क पर लोग रहने नहीं दे रहे। बस ही अब इनके लिए रात गुजारने का एकमात्र सहारा है। समूह में बुजुर्ग हैं, बच्चे, महिलाएं और बेटियां भी। महिलाओं और बच्चियों के लिए खुले में या सड़क किनारे रात काटने की स्थिति अलग चिंता पैदा कर रही है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन से पूछने पर जवाब मिलता है कि पुल और रास्ता बनने में कम से कम 15 दिन लग सकते हैं। यात्रियों के सामने सवाल है कि क्या सचमुच अगले 15 दिन इसी बस में बैठकर काटने होंगे?

बद्रीलाल मीणा कहते हैं, बस में महिलाएं, बच्चियां और बच्चे हैं। ऐसी स्थिति में 15 दिन कैसे काटेंगे, कुछ समझ नहीं पा रहे। हनुमान सिंह की चिंता रास्ते से आगे की है। कहते हैं, पुल जल्दी बनने की उम्मीद भी नहीं है। प्रशासन 15 दिन से पहले रास्ता खुलने को मुश्किल बता रहा है। हम यहां इतने दिन कैसे रुकेंगे और बच्चों-बुजुर्गों को कैसे संभालेंगे?

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29 अगस्त को नेपाल में प्रवेश करने वाला यह समूह लंबी तीर्थयात्रा पर निकला था। बाबा बागेश्वर धाम, चित्रकूट, अयोध्या, काशी विश्वनाथ और गोरखनाथ के दर्शन करने के बाद सोनौली के रास्ते नेपाल पहुंचा था। पशुपतिनाथ के दर्शन के बाद बिहार, झारखंड, कामाख्या, ओडिशा और गंगासागर होते हुए लौटने का कार्यक्रम था। लेकिन, कृष्णाभीर में रास्ता कटने के बाद पूरी यात्रा अचानक अनिश्चितता में फंस गई है।

नाथूलाल मीना कहते हैं, हमें कहा जा रहा है कि बस छोड़कर छोटी गाड़ियां मंगाकर काठमांडू से हटौंडा वाले वैकल्पिक रास्ते से निकल जाएं। लेकिन, इतनी छोटी गाड़ियां एक साथ कहां से आएंगी? बस में इतने लोग हैं। हर पांच-छह लोगों के लिए अलग गाड़ी चाहिए होगी। इतना पैसा कहां से लाएं? रामस्वरूप मीना कहते हैं, मान लीजिए किसी तरह सोनौली पहुंच भी गए तो वहां से आगे कैसे जाएंगे, यह भी पता नहीं। बस यहीं छोड़ दें तो सामान का क्या होगा और यात्रा कैसे पूरी होगी, कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा।

रामस्वरूप धारीवाल कहते हैं, हम तीर्थयात्रा के लिए निकले थे, यहां फंस जाएंगे, यह कभी सोचा नहीं था। अब न आगे जाने का रास्ता है, न पीछे लौटने का उपाय। हर तरफ चिंता है। कैलाशचंद बताते हैं कि समूह में बुजुर्गों और बच्चों की मौजूदगी के कारण परेशानी और बढ़ गई है। दिन किसी तरह निकल जाता है, लेकिन रात की चिंता सबसे ज्यादा है।

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धादिंग से गल्छी होते हुए गजुरी मार्ग पर खड़ी बस अब सिर्फ वाहन नहीं, इस समूह का अस्थायी घर बन गई है। भीतर सामान के बीच बुजुर्ग और बच्चे बैठे हैं, बाहर टूटी सड़क और बंद रास्ता है। राशन सीमित है और आगे कितने दिन रुकना पड़ेगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं। यात्रियों के पास सिर्फ इंतजार है। वे बार-बार रास्ता खुलने की जानकारी पूछ रहे हैं और आपस में यही सवाल कर रहे हैं। अगर 15 दिन तक रास्ता नहीं खुला तो क्या होगा?

बद्रीलाल मीणा की आवाज में चिंता साफ सुनाई देती है। हम किसी तरह यहां से सुरक्षित निकलना चाहते हैं। तीर्थयात्रा पर निकला यह समूह अब दर्शन और यात्रा के अगले पड़ाव की नहीं, सुरक्षित घर लौटने की चिंता में दिन काट रहा है।

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गजुरी गांव पालिका के अध्यक्ष गणेश लाल श्रेष्ठ बताते हैं कि किसी अतिथि को परेशानी नहीं होने दी जाएगी। तीर्थयात्रियों के समूह को नवनिर्मित गांव पालिका भवन में ठहराने का इंतजाम किया जा रहा है। वापसी तो रास्ता बनने के बाद ही संभव हो पाएगा।