लखनऊ [कुसुम भारती]। World Daughter's Day 2020: फिल्म दंगल का डॉयलाग 'मेरी छोरी छोरों से कम नहीं है के' बेटी दिवस के लिए सटीक बैठती है। फाइव जी के जमाने में आज भी कुछ लोगों का मानना है कि  माता-पिता के लिए ज्यादातर बेटे ही बुढ़ापे का सहारा बनते हैं। मगर अब बेटियों ने इस भ्रम को पूरी तरह से से तोड़ दिया है। शहर में बहुत सी ऐसी बेटियां भी हैं, जो न सिर्फ परिवार का सहारा बनीं, बल्कि शादी के बाद भी बेटों की तरह अपना फर्ज निभा रही हैं। विश्व बेटी दिवस के मौके पर ऐसी ही कुछ बेटियों पर रिपोर्ट...

बेटे की तरह बेटी निभा रहीं कर्तव्य

मेरी बेटी पिछले छह साल से पूरे घर की जिम्मेदारी निभा रही है। यह कहना है, भावना की मां रमा त्रिपाठी का। वह कहती हैं, पति सुरेश कुमार त्रिपाठी का देहांत 2019 में हो गया था। जबकि घर की जिम्मेदारी बेटी ने उनकी बीमारी के समय से ही उठा ली थी। वह यशोदा रस्तोगी बाल शिक्षा निकेतन स्कूल में शिक्षिका होने के साथ ही घर में इंटर तक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है। भावना की मां कहती हैं कि पति एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे। उनके निधन के बाद जैसे घर बिखर सा गया था। उस दौरान दोनों बेटियां पढ़ रही थीं। बड़ी बेटी भावना ने वक्त रहते घर को संभाल लिया। स्कूल में पढ़ाना और घर में ट्यूशन करके घर खर्च से लेकर छोटी बहन श्रद्धा की पढ़ाई संबंधी सभी जरूरतों को पूरा करने में खुद को आग की तरह तपाया है। एक बेटे की तरह वह सारे कर्तव्य निभा रही है। मुझे अपनी इस बेटी पर नाज है। वहीं,  भावना कहती हैं कि अभी मुझे छोटी बहन की शादी  की जिम्मेदारी भी निभानी है। उसके बाद ही मेरा कर्तव्य पूरा होगा। हालांकि, आर्थिक दिक्कतों के चलते चुनौतियां तो बहुत हैं, मगर हिम्मत हो तो सब मुमकिन है।

 

12 वर्ष की उम्र से परिवार की देखरेख 

लोग कहते हैं, वंश चलाने वाले बेटे घर का नाम रोशन करते हैं, मगर मेरे लिए तो मेरी बेटी ही सबकुछ है। आज उसकी वजह से ही मेरा घर चल रहा है। यह कहना है प्रतिभा त्रिपाठी की मां मधु पांडेय का। वह कहती हैं, पति का देहांत के समय बेटी की उम्र महज 12 वर्ष थी। पति का एक छोटा सा बिजनेस था। किडनी की समस्या के चलते पीजीआइ में भर्ती कराया। इलाज में घर की सेविंग सहित गहने भी बेचने पड़े। फिर भी हम उनको नहीं बचा सके। घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी। तीन बच्चों की जिम्मेदारी थी। मैं पढ़ी-लिखी भी नहीं थी। फिर मैंने एक दिन बेटी से कहा कि मैं लोगों के घरों में काम करके घर का खर्च चला लूंगी। उस वक्त वह आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी। इस पर बेटी ने कहा कि आपको काम करने की जरूरत नहीं है, मैं ट्यूशन पढ़ाकर घर का खर्च चला लूंगी। मजबूर होकर मुझे उसको इजाजत देनी पड़ी। बेटी ने ट्यूशन के साथ इंटर तक अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 2008 में 11वीं में थी जब उसने एक निजी कंपनी में नौकरी भी शुरू कर दी। वहीं, प्रतिभा कहती हैं, पढ़ाई के साथ ही नौकरी भी जारी रखी। उन्हीं पैसों से 2016 में मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स भी किया और 2017 में अपना खुद का मेकअप स्टूडियो खोल लिया। अपने दोनों भाइयों की पढ़ाई के साथ मां की जिम्मेदारी भी निभा रही हूं। हालांकि, शादी के बाद छोटे भाई को अपने साथ ही ले आई थी। बड़ा भाई एमए और छोटा भाई बीए करने के साथ ही कथक भी सीख रहा है। मुझे खुशी है कि मैं अपने परिवार के लिए एक बेटी और बहन होने का फर्ज निभा रही हूं। इसमें मेरे पति व ससुराल वाले भी न सिर्फ पूरा सहयोग देते हैं बल्कि वे भी मुझ पर गर्व करते हैं। 

 

बुढ़ापे का सहारा है बेटी 

हमारी दो बेटियां हैं। आज भले ही शादी के बाद वे दोनों हमारे साथ नहीं रहती हैं, पर एक ही शहर में रहने की वजह से उनके साथ जितना हो सके उतना समय बिताना और रोजमर्रा की जरूरतों में उनका हमें पूरा सहयोग मिलता है। यह कहना है, गृहिणी मुन्नी मिश्रा का। कहती हैं, पति कर्नल रमेशचंद्र 20 साल पहले रिटायर हो गए थे। बड़ी बेटी गृहिणी है और छोटी बेटी लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ाती है। दोनों बेटियों का पूरा सपोर्ट आज भी मिल रहा है। लोग कहते हैं, बेटे बुढ़ापे का सहारा होते हैं, मगर हमारे लिए तो बेटियां भी किसी बेटे से कम नहीं हैं। दोनों पूरा सपोर्ट करती हैं। वहीं, लखनऊ यूनिवर्सिटी में जंतु विज्ञान विभाग में प्रोफेसर बेटी डॉ.  गीतांजलि मिश्रा कहती हैं, माता-पिता के लिए जो भी किया जाए काम ही होता है फिर भी बचपन से आज तक मैंने कभी उनको बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी।

 

बहुत गर्व है बेटी पर 

मुझे अपनी बेटी पर बहुत गर्व है क्योंकि मेरी बेटी स्वाति पांडेय ने अपने परिश्रम और अद्वितीय लगन से आज समाज को नयी दिशा दी है। इतना ही नहीं वह समाज की अन्य बेटियों को भी नई दिशा व दृष्टि प्रदान कर रही है। बेटे का फर्ज मेरी बेटी निभा रही है, वही मेरा सहारा भी है। यह कहना है, आशा पांडेय का। वह कहती हैं, आइआइटी धनबाद से शिक्षा ग्रहण करने के बाद लंदन विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा को पूर्ण करके आज वह आत्मनिर्भर हो चुकी है। साथ ही वह मेक इन इंडिया की मुहिम को सार्थक करते हुए एक  कंपनी की सीईओ है। ऐसी बेटी पर किसे गर्व नहीं होगा। वहीं, स्वाति कहती हैं, मुझे पिछले वर्ष कार्टियर वूमेन ऑफ द ईयर सम्मान भी अपने नाम किया।

विभिन्न देशों में अलग-अलग दिन मनाते हैं बेटी दिवस 

बेटियों को समर्पित इस खास दिन को अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है। Daughter's Day को खासकर सितंबर महीने के चौथे रविवार को मनाया जाता है, जोकि इस बार 27 सिंतबर को है। वहीं, विश्व बेटी दिवस, 28 सितंबर को मनाया जाता है।

 

इंडियन टी20 लीग

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस