लखनऊ, अजय जायसवाल। उत्तर प्रदेश की विधानसभा ने बीते सप्ताह महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की। आजादी के 75 साल बाद पहली बार विधानसभा के मानसून सत्र का एक दिन केवल ‘मातृशक्ति’ के नाम रहा। सदन की कार्यवाही में महिला सदस्यों ने ही हिस्सा लिया और अध्यक्ष का आसन भी महिलाओं ने संभाला। जब महिलाओं को ही पूरा मौका मिला तो वे भी अपनी हिचक तोड़ती और खामोशी कहीं छोड़ती दिखीं। जिस तरह से 38 महिला सदस्यों ने लगभग पांच घंटे सदन में मुखर होकर ‘आधी आबादी’ के तमाम मुद्दे उठाए, उससे लगा कि अवसर और सहयोग मिले तो महिलाएं राजनीति में भी पुरुषों के साथ कदमताल को तैयार हैं। उन्हें ‘विधायक पति’ जैसी बैसाखी के सहारे की जरूरत नहीं है।

22 सितंबर को यूपी विधानसभा ने वह इतिहास रचा जो आज तक किसी भी राज्य की विधानसभा में कभी होता नहीं दिखा। जब प्रयासों की यह ‘मशाल’ जली है तो लंबे समय से हलक में अटका आधी आबादी का एक सवाल फिर सुलगने लगा है। वह है विधानसभा में उनकी समुचित भागीदारी का। दरअसल, 403 सदस्यों वाली यूपी विधानसभा में मात्र 47 सदस्य ही महिला हैं। पिछले दो दशक के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर दौड़ाने से स्पष्ट है कि 2017 के चुनाव में 42, वर्ष 2012 में 35, वर्ष 2007 में 23 और 2002 में 26 महिलाएं ही विधायक बनीं। विधानसभा में कभी भी महिला सदस्यों की संख्या 12 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है। ऐसे में यह सवाल वाजिब ही है कि जब समाज में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है, तो फिर विधानसभा में ‘आधी आबादी’ की इतनी कम भागीदारी क्यों?

आखिर कानून बनाने वाली राज्य की सबसे बड़ी पंचायत में आधी आबादी की ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? वर्षों पुराने इसी सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश में हुई ऐतिहासिक पहल से मिलने की उम्मीद जागी है। लोकतंत्र में बदलाव के नजरिए से देखी जा रही महिला सशक्तीकरण की इस पहल से अब उनके विधानसभा में एक-तिहाई होने के सपने के भी पूरे होने के आसार लगने लगे हैं। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना कहते हैं कि आजादी के 75 वर्षों के बाद सदन का एक दिन महिलाओं को दिया गया। यह महिला सशक्तीकरण की दिशा में मजबूत कदम है, नई शुरुआत है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी वैदिक उद्धरणों और आख्यानों का उल्लेख करते हुए भारतीय संस्कृति में महिलाओं की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि हम सभी को पता है कि मातृशक्ति से सबकुछ संभव है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ऐतिहासिक पहल पर सदन में बतौर नेता प्रतिपक्ष अपने विचार रखते हुए कहा भी कि सभी दल प्रयास करें कि अधिक से अधिक महिला विधायक चुनकर सदन में पहुंचें।

सवाल उठता है कि जब नौकरियों से लेकर नगरीय निकाय और पंचायत तक के चुनाव में महिलाओं के लिए एक-तिहाई यानी 33 प्रतिशत पद आरक्षित रखने की व्यवस्था है, तो फिर विधानसभा में क्यों नहीं? 403 सदस्यों वाली विधानसभा में अगर 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए रहे तो सदन में उनकी संख्या 133 हो, जबकि वर्तमान में मात्र 47 ही महिला सदस्य हैं। उम्मीद की जा रही है कि जिस तरह से महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बढ़ाया गया है, उसी तरह सदन में महिला सदस्यों की संख्या न्यूनतम 33 प्रतिशत सुनिश्चित करने की पहल भी सभी राजनीतिक दल करेंगे और नया इतिहास रचेंगे। यह कैसे होगा, इसका एक प्रयास इसी विधानसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश देख भी चुका है।

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने निश्चय किया था कि वह 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देंगी। इस दिशा में उन्होंने कदम बढ़ाया भी। यह दीगर बात है कि पार्टी आशातीत परिणाम नहीं ला सकी और कांग्रेस के दो ही विधायक जीतकर सदन में पहुंचने में कामयाब हुए, जिनमें एक महिला हैं और वही आराधना मिश्रा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल की नेता भी हैं। ऐसा नहीं है कि राजनीति या समाज ने महिलाओं के नेतृत्व को स्वीकार करने में कदम खींचे हैं। वर्तमान में देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु हैं। प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल हैं। आजाद के बाद महिला सशक्तीकरण की पहल उत्तर प्रदेश से ही हुई थी। देश में पहली महिला राज्यपाल सरोजनी नायडू बनीं। देश में पहली बार उत्तर प्रदेश ने ही वर्ष 1963 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सुचेता कृपलानी को बैठाया।

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, उत्तर प्रदेश]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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