लखनऊ(अजय श्रीवास्तव)। 22 मार्च यानी आज विश्व जल दिवस है। कम बारिश, सूखती धरती और कंकरीट में तब्दील होते तालाब और कुएं लखनऊ वासियों को भी पानी की कीमत याद दिला दी है। हाल यह है कि जितना पानी हम धरती से ले रहे हैं, उसका दस प्रतिशत पानी भी गगरी को नहीं दे रहे हैं। कहीं अनमोल पानी का कोई मोल नहीं है। बे हिसाब उसे बहाया जा रहा है तो कहीं बूंद-बूंद की दरकार रहती है।

हर साल लखनऊ के शहरी क्षेत्र में 60 से 70 सेंटीमीटर भूजल का स्तर गिर रहा है। पानी का अवैध दोहन पर कोई रोक न होने के कारण मनमानी जारी है। अधिक हॉर्सपॉवर के पंप लगाकर पानी निकाला जा रहा है और उसे टैंकरों में बेचा जा रहा है। पानी का ऐसा ही उपयोग बोतल बंद पानी और जार के लिए भी हो रहा है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के रीजनल डायरेक्टर वाइबी कौशिक कहते हैं कि जिनता पानी धरती से लिया जा रहा उतना धरती को वापस में नहीं मिल रहा है। लखनऊ के शहरी इलाके में हर साल 60 से 70 सेंटीमीटर भूजल का गिरना चिंता का विषय है। सड़कों के किनारे मिट्टी वाली जगह कंकरीट होने से भी बारिश का पानी बहाव से आगे निकल जाता है, जो नाला नदी होते हुए समुद्र में पहुंच जाता है और इस बारिश का लाभ धरती की कोख को नहीं मिल पाता है। वर्षा जलसंचयन के इंतजाम भी लखनऊ शहर में पर्याप्त नहीं है, इसलिए बारिश का पानी भी बेकार हो जाता है।

वह कहते हैं कि शहरी क्षेत्र में तेजी से आबादी बढ़ी है और आउटर क्षेत्र भी इससे वंचित नहीं है। ऐसे में बढ़े पैमाने पर नलकूप और सबमर्सिबल पंप से पानी का दोहन हो रहा है। यह भी भूजल के लिए चिंता का विषय है। अगर भूजल दोहन को इस तरह से किया गया तो आने वाले समय में पानी का घोर संकट खड़ा हो सकता है।

यह आदेश करने पड़

- नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशों के अनुक्रम में केंद्रीय भूमि जल प्राधिकरण द्वारा पहली बार इस दायरे में कृषि, औद्योगिक, व्यावसायिक, सरकारी, निजी क्षेत्र के साथ-साथ घरेलू उपभोक्ताओं को लाया गया है।

- भूजल के बढ़ते संकट को देखते हुए अब दोहन के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना अनिवार्य होगा।

- उत्तर प्रदेश में 45 लाख मिनी नलकूप है सिंचाई क्षेत्र में 70 फीसद, पेयजल सेक्टर में 80 फीसद तथा औद्योगिक क्षेत्र में 85 प्रतिशत भूजल का उपयोग होता है।

- सिंचाई में ही लगभग पाच मिलियन हेक्टेयर की दर से प्रति वर्ष भूजल का दोहन किया जा रहा है।

- प्रदेश के विभिन्न शहरों में हर रोज ढ 6800 मिलियन लीटर भूजल और ग्रामीण क्षेत्र में 9100 मिलियन लीटर भूजल पेयजल सेक्टर में निकाला जाता है।

यहा तो पानी नहीं मिलता

पानी संकट पर अगर नजर डाली जाए तो आलमबाग के बड़ा बरहा समेत आसपास के इलाकों में आज भी पानी के लिए रतजगा होता है। नलकूप जवाब दे चुके हैं तो हैंडपंप का पानी भी नीचे उतर गया है। गर्मी के आगमन के साथ ही पानी की मारामारी शुरू हो जाएगी। कूलर में पानी भरना दूर, नहाने के लिए पानी की जुगाड़ करनी पड़ती है। अलीगंज, पुराने शहर के इलाके, राजाजीपुरम, जानकीपुरम हुसैनगंज, चारबाग, लालकुआ समेत शहर के अधिकाश इलाकों में पानी संकट बना रहता है।

यहा अधिक गिरावट

गोमतीनगर, कैंट, गुलिस्ता कॉलोनी, नरही, विकासनगर, महानगर, इंदिरानगर, निरालानगर। इसमें हर साल गोमतीनगर, इंदिरानगर और निरालानगर में एक मीटर तक जलस्तर गिर रहा है।

Posted By: Jagran