लखनऊ, जेएनएन: नजाकत, नफासत और तहजीब के शहर-ए-लखनऊ की सदियाें पुरानी गंगा जमुनी तहजीब भगवान विश्वकर्मा की जयंती गुरुवार को एक बार फिर नजर आएगी। हिंदू-मुस्लिम कामगार एक साथ काम बंद कर औजारों की पूजा करेंगे। भगवान विश्वकर्मा देवी-देवताओं के शिल्पकार कहे जाते हैं। अस्त्र-शस्त्रों व वाहनों का निर्माण विश्वकर्मा जी ने किया था। भगवान विश्वकर्मा ने द्वारिका इंद्रपुरी, पुष्पक विमान और स्वर्ग का निर्माण किया था। 17 सितंबर को हर साल होने वाली पूजा में कामगार दुकान बंद कर औजारों की पूजा करते हैं।

आचार्य एसएस नागपाल ने बताया कि हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म के सातवे संतान जिनका नाम वास्तु था। विश्वकर्मा जी वास्तु के पुत्र थे, जो अपने माता-पिता की भांति महान शिल्पकार हुए। श्रृष्टि के साथ ही स्वर्गलोक हो, रावण की सोने की लंका हो या भगवान कृष्ण जी की द्वारिका और पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था।

ऐसे करें पूजा

भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा में अक्षत, हल्दी, फूल, पान, लौंग, सुपारी, मिठाई, फल, धूप, दीप और रक्षासूत्र का का प्रयोग करना चाहिए। मकबूलगंज स्थित 129 साल पुराने मंदिर में पांच लोगों की मौजूदगी में पूजन होगा। प्रबंधक त्रिभुवन नाथ शर्मा ने बताया कि मंदिर में कोरोना संक्रमण से बचाव के साथ पूजन होगा। मंदिर में हिंदू-मुस्लिम एक साथ करते हैं पूजनविश्वकर्मा मंदिर में 17 सितंबर को हिंदू-मुस्लिम एक साथ भगवान की पूजा करते हैं। मंदिर में भगवान विश्वकर्मा जी की प्रतिमा बनाने वाले राय बहादुर दुर्गा प्रसाद की प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित है। 1891 में उन्होंने प्रतिमा के साथ अपनी प्रतिमा का निर्माण किया था। एक पत्थर पर भगवान विश्कर्मा, हंस, नल और नील को बनाया गया है। निर्माण कला शैली ऐसी की प्रतिमा जीवंत दिखती है।

17 सितंबर को ही होती है विश्वकर्मा पूजा

भगवान विश्वकर्मा की जयंती को लेकर कुछ मान्यताएं हैं। कुछ ज्योतिषाचार्यो के अनुसार भगवान विश्वकर्मा जी का जन्म आश्विन कृष्णपक्ष का प्रतिपदा तिथि को हुआ था। वहीं कुछ लोगों का मनाना है कि भाद्रपद की अंतिम तिथि को भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। वैसे विश्वकर्मा पूजा सूर्य के पारगमन के आधार पर तय किया जाता है। भारत में कोई भी तीज व्रत और त्योहारों का निर्धारण चंद्र कैलेंडर के मुताबिक किया जाता है। लेकिन विश्वकर्मा पूजा की तिथि सूर्य को देखकर की जाती है। जिसके चलते हर साल विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को आती है।

दुनिया के पहले इंजीनियर है विश्वकर्मा

शास्त्रों की माने तो विश्वकर्मा वास्तुदेव के पुत्र हैं. जिन्होंने सृष्टि में कई चीजें बनाई हैं। माना जाता है कि पांडवों के इंद्रप्रस्त में मौजूद माया सभा भी भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाई थी। रावण के सोने की लंका को भी बनाने वाले विश्वकर्मा ही थे। इस तरह उन्होंने कई दर्लभ चीजों का निर्माण किया किया। जिससे उन्हें दुनिया का पहला इंजीनियर कहा जाता है।

विश्वकर्मा पूजा करने का फल

मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से दरिद्रता का नाश होता है। इनकी पूजा करने वाले को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं होती। इनकी पूजा से दिन दूनी तरक्की होती है। व्यापार और कारोबार फलता-फूलता है। इनकी पूजा करने वालों की सभी मनोकामना पूरी हो जाती है।

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