विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

शिक्षक राजनीति में बड़ा बदलाव: दलों के दबदबे के बीच संगठनों का सूपड़ा साफ, शून्य पर सिमटे

Published: Fri, 30 Oct 2026 02:58 AM (IST)

उत्तर प्रदेश में शिक्षक राजनीति का पारंपरिक समीकरण बदल रहा है, जहां अब राजनीतिक दलों का प्रभाव शिक्षक संगठनों पर हावी हो गया है।

News Article Hero Image

HighLights

  1. शिक्षक राजनीति में दलों का बढ़ता प्रभाव।

  2. विधान परिषद चुनाव में संगठनों की हार।

  3. शिक्षकों के मुद्दों की स्वतंत्र आवाज पर चिंता।

राज्य ब्यूरो, लखनऊ। प्रदेश में शिक्षक राजनीति का परंपरागत समीकरण बदलता दिख रहा है। शिक्षक संगठनों की जगह राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ने से शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व की प्रकृति पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विधान परिषद चुनाव में शिक्षक संगठनों के प्रत्याशियों की हार को इसी बदलाव का संकेत है।

पूर्व शिक्षक विधायकों को आशंका है कि राजनीतिक दलों के समर्थन से सदन में पहुंचे प्रतिनिधियों के सामने शिक्षकों की मांगों और दलगत प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी। सवाल सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि शिक्षकों की स्वतंत्र आवाज और उनके मुद्दों की धार बनाए रखने का भी है।
विधान परिषद के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में शिक्षक संगठन शून्य पर सिमट गए।

छह सीटों में से चार भाजपा और दो सपा ने जीती हैं। चुनाव का दिलचस्प पहलू यह है कि शिक्षक राजनीति में सक्रिय रहे चेहरे अब राजनीतिक दलों के साथ हैं। आगरा शिक्षक सीट पर डा. आकाश अग्रवाल ने सपा के टिकट पर और गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने भाजपा के समर्थन से जीत दर्ज की, जबकि पिछली बार दोनों निर्दलीय जीते थे।

संगठन, प्रबंधन और संसाधनों का उपयोग

साफ है कि शिक्षक मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए राजनीतिक अपने संगठन, चुनाव प्रबंधन और संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। शिक्षक भी राजनीतिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में शिक्षक संगठनों के सामने अपनी ताकत बनाए रखने की भी चुनौती है। पुरानी पेंशन, सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों की सेवा सुरक्षा, वित्तविहीन शिक्षकों का मानदेय, वेतन विसंगतियां आदि मुद्दे लंबे समय से शिक्षक राजनीति के केंद्र में रहे हैं।

पूर्व शिक्षक विधायकों की चिंता है कि यदि शिक्षक संगठनों का स्वतंत्र राजनीतिक दबाव कमजोर होता है तो शिक्षकों की मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की क्षमता भी प्रभावित होगी। पूर्व शिक्षक विधायक जगवीर किशोर जैन राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ने से मुद्दों के कमजोर पड़ने की आशंका जताते हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक दल, शिक्षक राजनीति पर हावी हैं।

इस चुनाव में मुकाबला सीधे भाजपा और सपा में था, शिक्षकों के मुद्दे कहीं नहीं थे। ऐसे में अब इसे शिक्षक निर्वाचन कहना ही सही नहीं, इसका नाम बदल देना चाहिए। शिक्षक संगठनों के राजनीतिकरण और वित्तविहीन शिक्षकों के अपने मुद्दों के बजाय राजनीतिक प्रभाव में मतदान से यह स्थिति बनी है। जो लोग वित्तविहीन शिक्षकों के वोट से जीत रहे हैं, वो भी उनकी आवाज नहीं उठा रहे।

वहीं, पूर्व शिक्षक विधायक सुरेश त्रिपाठी कहते हैं कि शिक्षकों के बहुत से संगठन बन गए हैं। इससे शिक्षकों की एकजुटता पहले जैसी नहीं रही। जो प्रतिनिधि राजनीतिक दलों से चुनकर जाएंगे, उनके सामने अपने दल की रीति-नीति के हिसाब से चलने की मजबूरी होगी।

यह भी पढ़ें- दिल्ली रैली से होगी टिकट के दावेदारों की परीक्षा, रामलीला मैदान में शक्ति प्रदर्शन से कांग्रेस परखेगी नेताओं का जनाधार

शिक्षक नेताओं का कहना है कि संगठनों को अपने मुद्दे और हितों की लड़ाई, आंदोलनों-संघर्ष आदि से जारी रखनी होगी। इससे भी जरूरी, छोटे संगठनों में बंटने के बजाय एकजुटता के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।