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यूपी में पांच साल से नहीं बांटे गए विश्वभारती सहित 46 पुरस्कार, विभाग की योजनाएं भी पड़ीं ठप

By Jagran NewsEdited By: Shiv Govind Mishraa
Published: Thu, 29 Oct 2026 01:20 AM (IST)

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान में पिछले चार वर्षों से पुरस्कार वितरण रुका हुआ है, जिससे 2022 के 46 घोषित पुरस्कार ...और पढ़ें

इस फोटो को AI के माध्यम से तैयार किया गया है।

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HighLights

  1. संस्थान में 2022 से 46 पुरस्कारों का वितरण रुका।

  2. कार्यकारिणी न होने से योजनाएं ठप, बजट वापस।

  3. विश्वभारती सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार लंबित।

महेन्द्र पाण्डेय, लखनऊ। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की स्थापना जिन उद्देश्यों से की गई थी, फिलहाल वह पूरा नहीं हो रहा। न तो नियमित योजनाएं चल रहीं, न पुरस्कार बंट रहे। नौ फरवरी 2024 को घोषित वर्ष 2022 के 46 पुरस्कार अब तक नहीं बांटे गए। शासन ने गड़बड़ी की आशंका पर इन पुरस्कारों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद पुरस्कार देने की न तो पुनर्प्रक्रिया शुरू की गई न ही वर्ष 2023, 24, 25 व 26 के पुरस्कारों के लिए आवेदन मांगे गए।

संस्कृत संस्थान प्रतिवर्ष विभिन्न वर्गों में 50 पुरस्कार देता है। वर्ष 2022 के लिए 46 पुरस्कारों की घोषणा की गई थी, जबकि चार के पात्र नहीं मिले थे। जबलपुर के प्रो. रहसबिहारी द्विवेदी का चयन प्रतिष्ठित विश्वभारती पुरस्कार (राशि पांच लाख रुपये) के लिए किया गया था। रहसबिहारी का कहना है कि सरकार पुरस्कार के नाम पर अपनी वाहवाही करती है लेकिन घोषित करने के बाद भी सम्मान न देना अपमान है।

रहसबिहारी की तरह ही अयोध्या के डा. देवी सहाय पांडेय 'दीप' को महर्षि वाल्मीकि पुरस्कार (राशि दो लाख एक हजार रुपये), वाराणसी के प्रो. आंजनेय शास्त्री को महर्षि व्यास पुरस्कार (राशि दो लाख एक हजार रुपये) व वाराणसी के ही प्रो. गोपबंधु मिश्र को महर्षि नारद पुरस्कार (राशि एक लाख एक हजार रुपये) के लिए चयनित किया था।

इनके अलावा, विशिष्ट पुरस्कार (राशि एक लाख एक हजार रुपये) के लिए प्रो. हृदयरंजन शर्मा- वाराणसी, प्रो. रमाकांत पांडेय- बांदा, प्रो. शंकर कुमार मिश्र- वाराणसी, प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी- वाराणसी, प्रो. रामपूजन पांडेय-वाराणसी का चयन किया गया था, लेकिन किसी को पुरस्कृत नहीं किया गया। 50 पुरस्कारों के लिए प्रतिवर्ष 42 लाख रुपये का बजट निर्धारित है। संस्थान को यह धनराशि 2022 से वापस करनी पड़ रही है।

कार्यकारिणी है नहीं, वापस हो रहा बजट

संस्थान की कार्यकारिणी का गठन वर्ष 2022 से नहीं किया गया है। अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारियों के न होने से संस्थान में योजनाएं नियमित नहीं चल रही हैं। संस्कृत संभाषण योजना पिछले वर्ष से ही ठप थी। दैनिक जागरण ने 11 अप्रैल 2026 को 'आनलाइन संस्कृत प्रशिक्षण योजना हुई ठप, 70 से अधिक बेरोजगार' शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इसके बाद विभाग ने इसे पुन: शुरू कराया। संस्थान सिविल सेवा का निश्शुल्क प्रशिक्षण भी देता है।

प्रयागराज और लखनऊ में इसके कोचिंग सेंटर हैं। वर्तमान में प्रयागराज केंद्र बंद है, जबकि लखनऊ केंद्र पर नया सत्र आवेदन लिए जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है। संस्थान का वार्षिक बजट 10 करोड़ रुपये है, लेकिन कार्यकारिणी और नियमित निदेशक नहीं होने से अधिकतर रुपये खर्च ही नहीं हो पाते। पिछले वर्ष संस्थान को पांच करोड़ रुपये से अधिक का बजट वापस करना पड़ा था। प्रेमेंद्र गुप्ता संस्थान के प्रभारी निदेशक हैं। वह सचिवालय में कार्यरत हैं और वहां के दायित्व के कारण वह नियमित संस्थान नहीं आते।

संस्थान के चार वर्षों के पुरस्कार वितरित न होने के बारे में फाइल देखकर ही कुछ कह सकूंगा। अध्यक्ष सहित कार्यकारिणी के चयन के बारे में सक्षम स्तर से निर्णय होने के बाद आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। - प्रेमेंद्र गुप्ता, प्रभारी निदेशक, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान

संस्थान के अध्यक्ष का एक विजन होता है। वह कार्यकारिणी को लेकर योजनाओं को आगे बढ़ाता है। कार्यकारिणी न होने से योजनाएं अक्सर स्थगित हो जाती हैं। कर्मचारी उन्हें नियमित आगे बढ़ाने पर निर्णय नहीं ले सकते। हां, अगर निदेशक की संस्कृत में रुचि और अनुभव हो तो भी वह योजनाओं को आगे बढ़ा सकता है, लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं है। - डॉ. वाचस्पति मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान