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उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव में 'माननीयों' का मिजाज बताएगा हवा का रुख

Published: Tue, 29 Sep 2026 09:21 AM (IST)

उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है, जो आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के समीकरणों और विधायकों के रुख को दर्शाएगी।

यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होगा मतदान।

यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को होगा मतदान।

HighLights

  1. उत्तर प्रदेश में 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू।

  2. यह चुनाव आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरणों को दर्शाएगा।

  3. सपा-कांग्रेस गठबंधन की भविष्य की दिशा और एकजुटता पर सवाल।

अजय शुक्ला, लखनऊ। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव आयोग ने बीते सप्ताह मतदान की तिथि घोषित कर दी है। मंगलवार से इसके लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और 16 अक्टूबर को मतदान के साथ ही परिणाम भी आ जाएगा।

ये चुनाव भाजपा के सात सदस्यों- केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, केंद्रीय राज्य मंत्री बी एल वर्मा, संगठन में राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर, उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल, महिला कोटे की सदस्य सीमा द्विवेदी व गीता शाक्य का नियमित कार्यकाल समाप्त होने और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का उप राज्यपाल बनाए गए डॉ. दिनेश शर्मा के त्यागपत्र से सीट रिक्त होने के कारण हो रहे हैं।

एक सीट सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव व एक बसपा के रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने से रिक्त हो रही है। बसपा के एकमात्र विधायक रहे उमाशंकर सिंह का निधन हो चुका है और अब उसकी सदस्य संख्या विधानसभा में शून्य है। ऐसे में उसकी कोई दावेदारी इस चुनाव में नहीं बनती।

403 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा व उसके सहयोगी दलों की प्रभावी संख्या इस समय 290 और सपा-कांग्रेस की 103 है। तीन निर्दलीय व असंबद्ध सदस्य हैं। सात सीटें रिक्त हैं।

ऐसे में सपा रामगोपाल की सीट बरकरार रखते हुए एक अतिरिक्त सदस्य आसानी से जितवा लेगी। इसी तरह भाजपा की सात सीटों पर उम्मीदवार आसानी से जीत जाएंगे। एक उम्मीदवार पर जोर आजमाइश होगी। यही इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू साबित होने वाला है।

याद करें कि जब दो साल पहले 10 सीटों के लिए चुनाव हुए थे, तब सपा के सात विधायकों ने बगावत कर दी थी। सपा की सहयोगी अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष पल्लवी पटेल ने भी भाजपा उम्मीदवार संजय सेठ का समर्थन किया था। सपा के लिए यह बड़ा झटका था क्योंकि सुभासपा व रालोद के बाद उसका तीसरा व अंतिम सहयोगी दल भी सत्तापक्ष के करीब पहुंच गया था।

यह अब तक प्रश्न है कि पल्लवी पटेल अब सपा के पाले में हैं भी या नहीं। सपा के जिन अपने विधायकों ने पालाबदल किया उनमें दल के मुख्य सचेतक रहे और वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री मनोज पांडेय भी थे। सपा इस चोट को अब तक सहला रही है।

यदि इस बार भी वह तीसरा उम्मीदवार खड़ा करती है तो जो भी परिणाम आएगा, वह अगले साल की शुरुआत में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के पालाबदल और पक्ष-विपक्ष के रणनीतिक कौशल में आए बदलाव का भी संकेत देगा।

यह इस बात का भी संकेत होगा कि मतदाता से सीधे जुड़ाव रखने वाले भावी उम्मीदवार व वर्तमान माननीय विधायक अगले विधानसभा चुनाव में किसके पक्ष में हवा का रुख देख रहे हैं। पिछले दिनों पक्ष-विपक्ष, दोनों तरफ से एक दूसरे के विधायकों के बड़ी संख्या में पालाबदल के लिए तैयार होने के दावे किए जाते रहे हैं। इस दावे पर अब हकीकत की मुहर लगेगी।

कांग्रेस और सपा साथ-साथ पर कितनी दूर तक?

समाजवादी पार्टी व कांग्रेस अगला विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ेंगे...इस रट्टा जवाब के बावजूद सपा और प्रदेश स्तरीय कांग्रेस नेताओं के गाहे-बगाहे ऐसे बयान आ जाते हैं जिससे यह सवाल उठ खड़ा होता है कि विपक्षी गठबंधन कितनी दूर तक चलेगा और इसकी सीमाएं क्या हैं।

गुरुवार को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपना पीडीए रथ सबसे पहले रायबरेली में घुमाकर चुनाव प्रचार की शुरुआत की तो इसके संकेत पढ़े जाने लगे। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अजय राय और जवाब में आए शिवपाल यादव के बयान से 'कितनी दूर साथ-साथ' का प्रश्न फिर सतह पर आ गया।

अजय राय ने कहा कि 'कोई भी चुनाव प्रचार के लिए पार्टी के हक में माहौल बनाने के मकसद से कहीं भी जा सकता है। अखिलेश यादव रायबरेली या अमेठी जा सकते हैं और इसी तरह कांग्रेस के नेता भी कन्नौज, इटावा या सैफई जा सकते हैं। विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल तैयारी कर रहे हैं।'

जिस तरह अखिलेश का रायबरेली जाना कांग्रेस को अखरा उसी तरह कन्नौज और सैफई का जिक्र सपा को अखर गया। जवाब में सपा महासचिव शिवपाल बोले- 'कांग्रेस को जसवंतनगर व सैफई से कोई वोट नहीं मिलेगा। उन्हें आना चाहिए, उनका स्वागत है।’

हाल ही में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सीट बंटवारे के सवाल पर कहा था कि ‘बिना कांग्रेस और राहुल गांधी के भाजपा को नहीं हराया जा सकता है,’ तो इसका जवाब सपा सांसद इकरा हसन ने यह कहकर दिया कि ‘उप्र में यदि भाजपा को कोई हरा सकता है तो वह अखिलेश यादव ही हैं। कांग्रेस अपने दम पर उप्र में कुछ नहीं कर पाएगी।’

प्रत्यक्ष तौर पर दोनों के बयान में कोई विरोधाभास नहीं है, लेकिन इनमें छिपा तंज और आशंका साफ उभर आती है। दोनों पार्टियां जान रही हैं कि अकेले विधानसभा चुनाव लड़ना बड़ा जुआ है, लेकिन यह भी जानती हैं कि कांग्रेस यदि उत्तर प्रदेश में कुछ हासिल कर सकती है तो वह भाजपा-बसपा से अधिक सपा की कीमत पर ही करेगी। कांग्रेस का वोट बैंक सबसे ज्यादा सपा ने ही हड़पा भी है। ऐसे में फिलहाल तो साथ-साथ हैं, लेकिन कितनी दूर तक? यह पहेली विधानसभा चुनाव के बाद ही सुलझना शुरू हो सकेगी।

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