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पश्चिमी यूपी में बसपा का चुनावी दांव: मायावती जल्द करेंगी प्रत्याशियों का ऐलान, सोशल इंजीनियरिंग पर जोर

Published: Wed, 15 Jul 2026 09:04 AM (IST)

पार्टी सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखते हुए बूथ स्तर तक संगठन मजबूत कर रही है और कांग्रेस से गठबंधन की संभावना पर भी चर्चा है।

मायावती।

मायावती।

HighLights

  1. बसपा पश्चिमी यूपी की एक-तिहाई सीटों पर प्रत्याशी चुनेगी

  2. मायावती ने जुलाई तक घोषणा करने के निर्देश दिए हैं

  3. सामाजिक समीकरणों और गठबंधन पर भी पार्टी की नजर

राज्य ब्यूरो, जागरण, लखनऊ। विधानसभा चुनाव में भले ही अभी छह माह से ज्यादा का वक्त है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी प्रत्याशियों के चयन में तेजी से जुटी है। वैसे तो पूर्वी व मध्य उत्तर प्रदेश से लेकर बुंदेलखंड की भी कुछ-कुछ सीटों के प्रत्याशी तय हो चुके हैं, लेकिन पार्टी सुप्रीमो मायावती की खास नजर पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर है।

उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों से कहा है कि जुलाई में ही मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद व बरेली मंडल की लगभग 100 सीटों में से एक-तिहाई सीटों के प्रत्याशियों का चयन कर घोषित कर दिया जाए।

मंगलवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ बैठक में मायावती ने बूथ स्तर तक संगठन को खड़ा करने के साथ ही सदस्यता अभियान की प्रगति और साफ-सुथरी छवि वाले प्रत्याशियों के चन के संबंध में चर्चा की।

बसपा प्रमुख मायावती ने पश्चिम के पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक की

सूत्रों के अनुसार बसपा प्रमुख ने पदाधिकारियों से कहा है कि सोशल इंजीनियरिंग का ध्यान रखते हुए पश्चिम की सीटों के 30 से 35 प्रत्याशी जुलाई में ही तय कर लिए जाएं। इनमें 15 तय भी किए जा चुके हैं, जिनकी स्थानीय स्तर पर घोषणा का कार्यक्रम तय किया जा रहा है। प्रभारी घोषित किए जाने वाले चयनित प्रत्याशियों में मुस्लिम समाज के साथ ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व पिछड़ी जातियों के हैं।

उल्लेखनीय है कि पूर्व में भी बसपा चयनित प्रत्याशी को पहले-पहल विधानसभा प्रभारी बनाती है। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद विधिवत चयनित प्रत्याशियों की सूची जारी करती है।

पश्चिमी उप्र की एक-तिहाई सीटों पर बसपा प्रत्याशियों का चयन जल्द

सूत्रों के अनुसार अब तक अकेले ही विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरने की घोषणा करती रही बसपा प्रमुख चाहती हैं कि 403 विधानसभा सीटों में से आधी से अधिक पर प्रत्याशी चयन का काम जल्द से जल्द पूरा हो जाए ताकि उन सीटों पर अभी से व्यापक तैयारी कर पार्टी की स्थिति मजबूत की जा सके। ऐसा होने पर भविष्य में दूसरी पार्टी से गठबंधन में संबंधित सीटों पर मजबूती के साथ दावा किया जा सके।

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डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर बसपा

जानकारों का कहना है कि भले ही मायावती गठबंधन की चर्चा को सिरे से खारिज करती रही हैं, लेकिन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन किया। चूंकि डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर बसपा लगातार कमजोर ही होती दिखी इसलिए कांग्रेस से गठबंधन की चर्चा अंततः हकीकत में भी बदल सकती है। ऐसे में सर्वाधिक नुकसान सपा को ही हो सकता है।

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विदित हो कि पिछले लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के गठबंधन से भाजपा को बड़ा झटका लगा था। बसपा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी।