सोनभद्र, [अजय जायसवाल] । महीने में चालीस किलो मुफ्त राशन, साथ में रिफाइंड और नमक भी...! भाजपा सरकार की यह जनकल्याणकारी योजना है तो विरोधी दलों की नजर में गरीबों को बरगलाने का असफल प्रयास। दल तो अभी वोटों के भूखे हैं। इन्हें दावों का चिमटा थामे सेंकने दीजिए राजनीति की रोटियां और हम झांकने चलते हैं उन गरीब आदिवासियों की झोपड़ियों में जहां सत्ता के उलटफेर पर नहीं, बल्कि चूल्हे में आग देख चेहरे चमकते हैं। बच्चे भूखे न सोएं, यही परम सुख है। खैर, अब इनका पेट भरा है तो डकार सुनाई देती है। न, इन्हें रोटी में राजनीति नहीं दिख रही। यह आदिवासी बहुल आबादी वाले सोनभद्र के वह स्वाभिमानी हैं, जो अपने कीमती वोट से 'नमक का कर्ज' हर हाल में उतारने को बेताबी से बैठे हैं। पेश है अति पिछड़े जिले सोनभद्र के दुर्गम क्षेत्र से खास रिपोर्ट।

पथरीले दुर्गम क्षेत्र में बेहद कठिन जीवन जीने वाली आदिवासी महिलाएं मुफ्त राशन मिलने से खुद को मोदी-योगी का कर्जदार मानने से नहीं हिचकती हैं। अनपरा से 20 किलोमीटर पहले दुद्धी विधानसभा के सिन्दूर ग्रामसभा के मकरा टोला की कमला देवी बताती हैं कि राशन मुफ्त मिल रहा है। खपरैल के बने अपने मकान की दरकती कच्ची दीवार दिखाते कहती हैं कि फार्म भरा, लेकिन मकान नहीं मिला। वोट देने के सवाल पर बड़ी मासूमियत से कहती हैं कि यह तो पुराना रिवाज है साहब, किसी का नमक खाकर बदला नहीं जाता, बल्कि कर्ज उतारते हैं। अब तो राशन के साथ रिफाइंड व नमक भी मिल रहा है।

कर्ज उतारने के लिए उनके पास तो सिर्फ परिवार का वोट है, जिसे ‘कमल के फूल’ का बटन दबाकर मोदी-योगी को देंगी। पास खड़ी लाखा रानी उनके समर्थन में सिर हिलाते हुए कहती हैं कि जिसका नमक खाएंगे, उसको वोट देकर कर्ज तो उतारेंगे ही। मकरा गांव के पपनू कहते हैं कि जो राशन-पानी खिला-पिला रहा है, उसका ध्यान रखा ही जाएगा। सुकृत में पोखरा के पास रहने वाली छह बच्चे की मां खैरुल निंशा बताती हैं कि मुफ्त राशन के भरोसे जिंदा हैं, क्योंकि शौहर को मजदूरी मिल नहीं रही और कमाई का कोई दूसरा साधन है नहीं। पिपरी के मनोज चौबे कहते हैं कि जो इतना सब कुछ पा रहा है, वह वोट डालने समय मोदी-योगी के बारे में क्यों नहीं सोचेगा?

मुर्धवा मोड स्थित मिठाई की दुकान पर काम कर रहे गुड्डू हों या फल की दुकान चलाने वाले भरतलाल चौहान, कहते हैं कि आप जरा दुर्गम क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के बीच जाकर देखिए। मुफ्त राशन के साथ ही एक किलो मिलने वाले नमक का कहीं ज्यादा असर देखेंगे। गांव में जाने पर उनकी बात में दम दिखा। सीधे-सादे आदिवासी कहते मिले कि अब तो सीधे नमक भी मोदी-योगी का खा रहे हैं, इसलिए उनका कर्ज तो उतारेंगे ही। कटौली में भगवान दास कहते हैं मकान मिला है। मुफ्त राशन मिल रहा है। ऐसे में जिसका नमक खाएंगे, उसी के गुण गाएंगे। मझौली खुर्द की कुसुम बताती है कि यहां काम न मिलने से बेटा हैदराबाद में है।

मोदी-योगी जी के गल्ले से ही परिवार का गुजारा हो रहा है इसलिए किसी और की बातों पर क्या विश्वास किया जाए? गौरतलब है कि गरीब कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने वालों को भाजपा अपना लाभार्थी वोट बैंक मानती है। पार्टी को उम्मीद है कि उनकी सरकार की योजनाओं से खासतौर से हर धर्म-जाति के गरीबों को हर तरह से बहुत लाभ हुआ है जिससे उनका वोट अबकी भाजपा को ही मिलेगा। जानकारों का मानना है कि इन योजनाओं से सपा के साथ ही बसपा को भी राजनीतिक तौर पर कहीं बड़ा नुकसान हो सकता है।

नमक में सीसा, चावल में प्लास्टिक की 'सियासी मिलावट' : सीधे-सादे आदिवासियों पर मुफ्त राशन, नमक, तेल आदि के गहरे असर से विपक्षी परेशान दिखते हैं। उन्हें अपनी ओर मोड़ने के लिए खुलेआम दुष्प्रचार करते देखा जा सकता है। दुद्धी क्षेत्र में सपा के पैम्फ्लेट बांट रहे व्यक्ति ने गांव जाने के लिए साधन का इंतजार कर रही महिला को समझाते हुए कहा कि मुफ्त के मिल रहे चावल में प्लास्टिक है। नमक पानी में डालकर देखना, तब पता चलेगा कि उसमें सीसा मिला हुआ है। उसे यह बताने में भी नहीं चूकते कि मोदी-योगी का यह ऐसा जहर है, जिससे एक दिन में कोई नहीं मरता लेकिन पांच साल में कोई जिंदा नहीं बचेगा।

कर्जमाफी से कर्ज उतारने तक : कटौली के पठारी गोड़ आदिवासी बृजकिशोर कहते हैं कि पहले जिनको वोट देते रहे, उन्होंने कुछ नहीं किया। योगी जी की सरकार में उनका एक लाख का कर्ज माफ हुआ है। किसान सम्मान निधि का पैसा भी मिल रहा है। श्रमकार्ड बना है। हैंडपंप, शौचालय और सोलर लाइट भी मिली है। बेटा कुछ नहीं करता लेकिन बहु मालती समूह सखी है। 40 किलो मुफ्त राशन से परिवार के पेट की चिंता नहीं है। पत्नी उर्मिला देवी कहती हैं कि मोदी जी ने चुनावी जनसभा में कहा है तो अब पक्के तौर पर उन्हें पक्का आवास भी मिल ही जाएगा इसलिए वोट मोदी-योगी को नहीं देंगे तो क्या उनको दें जो चुनाव में वादा करके हमलोगों को भूल जाते हैं।

आदिवासी बेटी चाहे मोदी-योगी से इंटर कालेज : दुद्धी क्षेत्र के कटौली में रहने वाली आदिवासी पूनम बताती हैं कि इस दुर्गम क्षेत्र के बच्चों का आठवीं के बाद पढ़ाई करना न केवल मुश्किल बल्कि खर्चीला भी है। सोनभद्र से स्नातक करने वाली कुमारी पूनम नेटी कहती हैं कि हाईस्कूल के लिए दुद्धी या रेनुकूट जाने पर हर बार 30 रुपये खर्च होते हैं। बीए के लिए राबर्ट्सगंज आने-जाने में 140 रुपये लगने के कारण वह महीने में 15 दिन ही कालेज जाती थीं। उनके साथ आठ और लड़कियां भी थी। श्रम कार्ड के लिए आवेदन करने वाली पूनम बताती हैं कि वह ‘दैनिक जागरण’ के माध्यम से मोदी-योगी से अनुरोध करती हैं कि उनके कटौली में इंटर कालेज ही खोल दिया जाए, ताकि गरीब बच्चे भी पढ़ सकें।

Edited By: Prabhapunj Mishra