लखनऊ [सद्गुरु शरण]। अयोध्या में सरयू तट पर खड़े होकर इसकी लहरों की लय में उतावलापन महसूस किया जा सकता है। यह व्यग्रता सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को लेकर है जिससे तय होगा कि राम जन्मभूमि विवाद पर लंबी अदालती प्रक्रिया के निष्कर्ष क्या हैं।

सरयू के साथ पूरी अयोध्या में यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि राम मंदिर कब और कैसे बनेगा। बहरहाल, राम मंदिर पर फैसले के इंतजार में व्यग्र हो रही अयोध्या के उल्लास की वजह कुछ और भी है। अयोध्या और सरयू राम से भी पहले की हैं लेकिन अब इनका स्वरूप बदल रहा है। राम मंदिर का विषय अपनी जगह है, पर इससे पहले अयोध्या में राम की एक ऐसी प्रतिमा स्थापित होने जा रही है जो दुनिया की किसी भी दूसरी प्रतिमा से अधिक ऊंची होगी। सरयू पर देश का सबसे लंबा घाट बन रहा है। अयोध्या के मुकुट में ऐसे कई और नगीेने सजने जा रहे हैं और यह सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इच्छा एवं योजना का सुफल है। अयोध्या और गोरक्ष पीठ का रिश्ता पुराना एवं आत्मीय है।

महंत अवेद्यनाथ ने राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष के रूप में वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन को रणनीति, दिशा और धार दी। अब जब वह आंदोलन निर्णायक चरण में है, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पदारूढ़ योगी आदित्यनाथ के एजेंडे में अयोध्या सर्वोपरि है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ अपने अब तक करीब 32 महीने के कार्यकाल में अयोध्या की 12 यात्राएं कर चुके हैं। उनके कार्यकाल की तीनों दिवालियों में अयोध्या में असाधारण दीपोत्सव आयोजित हुए। अयोध्या, सरयू और साधु-संत गदगद हैं। रामनगरी में योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता जाति और धर्म से परे है। वह नई अयोध्या के नए नायक हैं।

थोड़ा धीमे चलिए अखिलेश बाबू

आम-ओ-खास लोगों की तरह राजनीतिक दलों को भी राम जन्मभूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार है। सबको पता है कि यह फैसला देश, खासकर उत्तर प्रदेश की मौजूदा सामाजिक, सांस्कृतिक, सामुदायिक व राजनीतिक बनावट में बड़े बदलाव पैदा करेगा। जाहिर है, ऐसा मानकर सभी राजनीतिक दल लगभग निष्क्रिय रहकर फैसले का इंतजार कर रहे हैं, पर कई महीने से निष्क्रिय चल रही समाजवादी पार्टी अचानक कसरत करने लगी। सपा नेताओं के ऐसे बयान आ रहे हैं, मानो योगी सरकार को महीने-दो महीने में ही उखाड़ फेकेंगे। सपा की विचित्र हरकतें उपचुनाव नतीजे आने के बाद शुरू हुई हैं।

दरअसल, लोकसभा चुनाव नतीजों ने इस पार्टी का ऐसा खस्ताहाल कर दिया था कि कई महीने पार्टी औंधे मुंह पड़ी रही। इस पृष्ठभूमि में उपचुनाव में भाजपा की आंतरिक कमजोरियों की वजह से कुछ सीटें पाकर सपा ऐसा हास्यास्पद प्रदर्शन कर रही, जैसे उसे कोई नया जनादेश मिल गया। अब तो अखिलेश यादव के प्रशंसक भी उन्हें राजनीतिक अपरिपक्व ठहराते हैं। पूर्व सीएम अखिलेश अपनी कार्यशैली से अक्सर इसे साबित करने का प्रयास करते दिखते हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन की बात अब पुरानी हो चुकी, पर ऐसा लगता है कि अखिलेश अब भी प्रदेश की जनता का मानस नहीं समझ पा रहे। अगले विधानसभा चुनाव में अभी करीब ढाई साल बाकी है। सपा को जनता के बीच जाना चाहिए और अपने समाजविरोधी राजनीतिक फैसलों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए। उनके लिए सबसे अधिक जरूरी है कि वह सकारात्मक रहें क्योंकि मोदी-योगी की जोड़ी रहते उन्हें राजनीतिक मुद्दे मुश्किल से ही मिलेंगे। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन सरकारों के साथ उनके पिताजी की भी शुभकामनाएं हैं। अखिलेश अभी अपेक्षाकृत युवा हैं। उनके सामने लंबा भविष्य है। उन्हें धैर्यपूर्वक आगे बढऩा चाहिए। उन्हें दही और चूने का फर्क भी याद रखना चाहिए।

सियासत में शुभकामनाएं

प्रदेश का राजनीतिक माहौल अतीत में इतना विषाक्त रहा कि अब किसी नेता की सदेच्छा में भी लोग सियासत तलाशते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को दिवाली की शुभकामनाएं देने उनके घर क्या गए, लोगों के पेट में गैस उमड़ने-घुमड़ने लगी। वो तो गनीमत रही कि सीएम योगी आदित्यनाथ वहां से निकलकर कल्याण सिंह को भी शुभकामनाएं देने पहुंच गए।

इससे लोगों को यह भरोसा हुआ कि उनका एजेंडा दिवाली की शुभकामनाएं ही थीं, और कुछ नहीं। यद्यपि कुछ जिद्दी लोग इसके बावजूद यह बात मानने को तैयार नहीं। उनके अपने तर्क-कुतर्क हैं। एक साहब का कहना है कि योगी जी की मुलायम सिंह से मुलाकात यदि सिर्फ त्योहारी शिष्टाचार थी तो वह सिर्फ मुलायम सिंह से क्यों मिले, अन्य दलों के नेताओं से क्यों नहीं? इसका जवाब यही हो सकता है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी होने के बावजूद लोकसभा में मोदी सरकार की सराहना और दोबारा सत्ता में लौटने की कामना क्या मुलायम सिंह के अलावा कोई अन्य विपक्षी नेता कर सकता है? 

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