आशुतोष शुक्ल। वैसे तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में आयोजित यह महज एक काव्य समारोह था, परंतु मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण ने उसे विशिष्ट बना दिया। लगभग 20 मिनट के अपने संबोधन में योगी ने वह विषय उठाया जो कई दशकों से संस्कृति के विभिन्न विमर्शो में प्रमुखता पाता रहा है। उन्होंने जब कहा कि, मनुष्य का मजहब बदल सकता है, पूर्वज नहीं, तो उन्होंने हिंदू शब्द की भौगोलिक व्याख्या की। इंडोनेशिया की रामलीला का संदर्भ देकर उन्होंने कहा कि वहां मुस्लिम कलाकार रामलीलाओं में राम और सीता बनते हैं और स्वयं को राम का वंशज मानते हैं।

योगी बोले, मजहब तो देश, काल-परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है, लेकिन पुरखे तो सबके हमेशा एक ही रहेंगे। उनका अभिप्राय था कि भारत में रहने वाला चाहे जिस धर्म को मानता हो, उसे यह मानना चाहिए कि उसके पूर्वज हिंदू थे। योगी ने भगवान राम को अयोध्या में गत चार वर्षो से हो रहे दीपोत्सव के साथ इसे जोड़ा। इसके बाद उन्होंने कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट चिंतन को भी लपेटा। उन्होंने कहा कि इन्हीं दोनों वर्गो के कारण भारत में अनेक प्रकार की समस्याएं आईं। योगी का भाषण बौद्धिक चिंतन की सनातन धारा को समर्थन दे गया। विडंबना है कि जब-जब समस्त भारतीयों के एक पूर्वज होने की बात उठती है तो बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग उसके विरुद्ध खड़ा हो जाता है। विज्ञान की कसौटी पर धर्म को कसने वालों की दृष्टि में डीएनए की ताíककता तब समाप्त हो जाती है।

रविवार को योगी ने ऐसा ही एक और काम किया। सिख इतिहास में चार साहिबजादों का बड़ा महत्व है। उनकी शहादत की कहानी बड़ी माíमक और प्रेरक है। अंतिम सिख गुरु गोबिंद सिंह महाराज के चार पुत्र थे-अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह। साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह मुगलों से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि दोनों छोटे साहिबजादों जोरावर और फतेह सिंह को इस्लाम न कुबूल करने पर औरंगजेब के मंत्री वजीर सिंह ने 27 दिसंबर को दीवार में जिंदा चुनवा दिया था। इसी दिन साहिबजादा दिवस मनाया जाता है।

इन्हीं नन्हें साहिबजादों की स्मृति में योगी ने रविवार को अपने सरकारी आवास में भव्य आयोजन किया। ऐसा कोई कार्यक्रम पहली बार मुख्यमंत्री आवास में हुआ। महत्वपूर्ण यह नहीं कि इस कार्यक्रम में कितने मंत्री या प्रमुख लोग आए, बल्कि यह है कि योगी ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को दृढ़ता से थामे रखा है। उन्होंने ही पहली बार गुरु नानकदेव का प्रकाशोत्सव मुख्यमंत्री आवास में मनाया था। भारतीय इतिहास के विस्मृत किए गए पन्नों से निकाल कर अप्रतिम साहिबजादों के सम्मान में सरकारी आवास में हुआ आयोजन लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

आइपीएस के पीछे पुलिस : पिछले हफ्ते एक और अनोखी घटना घटी। पशुपालन विभाग में पिछले साल टेंडर दिलाने के नाम पर बड़ा घोटाला हुआ था। इसमें एक आइपीएस अरविंद सेन का नाम भी उछला। जांच के दौरान ही अरविंद सेन लापता हो गए। पहले उन्हें भगोड़ा घोषित किया गया और शनिवार को उनके घर के बाहर डुगडुगी बजाई गई। मुख्यत: नव धनिकों की कालोनी गोमतीनगर में उनके घर के बाहर सरकारी कर्मचारियों ने बाजा बजाकर पहले तो आसपास वालों का ध्यान आकर्षति किया और फिर घोषणा की कि यदि निलंबित डीआइजी अरविंद सेन अदालत में हाजिर नहीं होते तो उनकी संपति कुर्क कर दी जाएगी।

वैसे तो इस प्रकार के मामलों में पुलिस की यह रूटीन प्रक्रिया होती है, परंतु किसी बड़े पुलिस अधिकारी के घर के बाहर वसूली की मुनादी होना बड़ी घटना है। सेन के यहां डुगडुगी बजने का वीडियो वायरल हुआ और चारों तरफ हल्ला मच गया। हाल फिलहाल ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देखने-सुनने में नहीं आया। पिछले दो महीनों में भगोड़ा घोषित होने वाले सेन दूसरे आइपीएस हैं। इससे पहले महोबा के पूर्व एसपी मणिलाल पाटीदार को भी पुलिस भगोड़ा विभूषित कर चुकी है।

बदमाशों का पीछा करने वालों के पीछे पुलिस लगी है..।

[संपादक, उत्तर प्रदेश]

Indian T20 League

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप

kumbh-mela-2021