वाराणसी [सौरभ चंद्र पांडेय]। सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए सियासी समर में सुरों की धार की भी बड़ी मीठी मार होती है। हर बार चुनावों में ऐसे गीतों के लिए अलग ही रियाज किया जाता है। अबकी निर्वाचन आयोग ने कोविड संक्रमण के मद्देनजर सभाओं-रैलियों और जुलूसों आदि पर बंदिशें लगाईं लेकिन विभिन्न विधाओं के ये गीत ही हैं जो अपना असर दिखाने लगे हैं। सबसे रोचक बात यह कि इस बार आयोग ने लोक गायकी को खास तौर पर तरजीह दी और राजनीतिक दलों की ओर से होने वाले बिरहा, कव्वाली आदि के कलाकारों के लिए अनिवार्यत: 5500 रुपये की सम्मान राशि निर्धारित कर दी।

रैलियों और रोड शो पर पाबंदी के कारण निर्वाचन के आरंभिक दौर में ही प्रचार की कमान लोक गायकों ने थाम ली है। वह अपनी गायकी से पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। बड़े कलाकारों के साथ-साथ छोटे कलाकारों को भी डिजिटल मंच मिला है। राजनीतिक दल इन कलाकारों के माध्यम से अपना बखान करा रहे हैैं, हालांकि कुल मिलाकर आनंद ले रही है जनता।

पहले नहीं थी भुगतान की व्यवस्था : पहले के चुनावों में कलाकारों को भुगतान का कोई उल्लेख नहीं होता था। अब प्रत्याशियों के लिए खर्च की सूची में चुनाव आयोग ने लोक गायकी को शामिल कर दिया है। इसके लिए 55 सौ रुपये की दर निर्धारित की गई है। जिसे प्रत्याशियों को अपने खर्च के ब्योरे में दर्ज करना होगा। चुनाव आयोग के इस कदम से संगीत की इस विधा से जुड़े कलाकार गदगद हैं। उनका कहना है कि कोरोना काल ने कलाकारों को बेहाल कर दिया है। चुनाव में पहले भी उनकी भागीदारी प्रचार-प्रसार में होती रही है, लेकिन इस बार दर तय कर दिए जाने से इस विधा को प्रोत्साहन मिलेगा। प्रत्याशी को इनकी मदद लेने पर न्यूनतम 5500 रुपये का भुगतान करना ही होगा।

इंटरनेट मीडिया से गीतों का बढ़ रहा क्रेज : चुनावी गीत-संगीत से इंटरनेट मीडिया गुलजार है। इसमें भी भोजपुरी को खास तौर पर पसंद किया जा रहा है। कौन सी धुन श्रोताओं को कब भा जाए और कौन सा गीत रातों-रात हिट हो जाए यह किसी को नहीं पता। देखा जाए तो इस दौर में एक प्रतियोगिता का माहौल बन गया है। कलाकार एक ही गीत को अलग-अलग धुनों पर अपनी आवाज दे रहे हैं। कलाकारों का मानना है कि चुनाव आयोग ने जो राशि तय की है वह डिजिटल माध्यम के लिए तो ठीक है लेकिन मंच का कार्यक्रम इतने राशि में संभव नहीं हो सकेगा।

कहते हैं कलाकार : गीतकार कन्हैया दुबे केडी कहते हैं कि चुनाव आयोग का यह कदम बहुत ही सराहनीय है। संगीत जगत संक्रमण काल के जिस कठिन दौर से गुजर रहा है। यकीनन यह एक मिसाल कायम करेगा। बिरहा, आल्हा भजन कव्वाली कलाकारों के लिए यह अनुदान तो ठीक है। लोकविधा के अन्य कलाकारों के लिए भी विचार करना चाहिए। लोक गायक विष्णु यादव का कहना है कि महंगाई के दौर में यह राशि डिजिटल माध्यम के लिए तो ठीक है। मंचीय आयोजन में तो संगत कलाकारों का खर्च भी नहीं हो पाएगा। फिर भी खुशी है कि कलाकारों को चुनाव प्रचार में आयोग ने शामिल किया है।

परितोष नहीं प्रोत्साहन राशि तय की गई : उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सदस्य दीपक सिंह का कहना है कि बढ़ते संक्रमण के दौर में चुनाव प्रचार डिजिटल हुआ है। इसका सीधा फायदा कलाकारों को मिल रहा है। राजनीतिक दल अपने विचारों से जनता को जोड़ने के लिए कलाकारों का सहारा ले रहे हैं जो अच्छी पहल है। चुनाव आयोग की ओर से परितोष नहीं प्रोत्साहन राशि तय की गई है।

निर्वाचन आयोग की ओर से तय रेट

  • आल्हा भजन कव्वाली लोकगीत बिरहा : 5500
  • जादू-कठपुतली : 2500
  • लघु सांस्कृतिक दल (पांच कलाकार) : 6000
  • वृहद सांस्कृतिक दल (10 कलाकार) : 8000
  • नाटक-नौटंकी : 3500
  • ढोल खजड़ी पार्टी : 1000
  • बैंड-बाजा पार्टी : 3500

Edited By: Umesh Tiwari