लखनऊ (जेएनएन)। हैचिंग चैंबर से जैसे ही चीं-चीं की आवाजें आईं तो दौड़कर कीपर पास पहुंचा और उसने अधिकारियों को इसकी सूचना दी। कुछ ही देर में वन विभाग के बड़े अफसर भी पहुंच गए। सभी को यह समझ में आ गया था कि कुछ ही देर में अंडों से घडिय़ाल के बच्चे बाहर निकलने वाले हैं। कीपर ने बालू हटाई तो अंडे का थोड़ा हिस्सा तोड़कर घडिय़ाल के बच्चे ने सिर निकाला और बाहर की दुनिया देखी। कुछ ही देर में यहां एक-एक कर अंडों से 126 नन्हे घडिय़ालों ने जन्म लिया।

यह नजारा लखनऊ के कुकरैल स्थित घडिय़ाल प्रजनन केंद्र का है। अंडे से बच्चे बाहर आने के बाद तुरंत चलने भी लगे। इस रोचक नजारे को देख रहे कुछ युवाओं के पास घडिय़ाल के बच्चे आए तो वह घबरा गए। ...तभी वन अधिकारियों ने बताया कि ...चिंता मत करो अभी तो इनके दांत भी नहीं हैं। अति संकटग्रस्त श्रेणी में आने वाले घडिय़ालों का यहां प्रजनन होता है।

पहले यहां पर चंबल, घाघरा व गेेरुआ नदियों के किनारे से घडिय़ाल के अंडे लाए जाते थे। उनकी यहां पर प्राकृतिक तरीके से हैचिंग की जाती थी। अब यहां पर चार मादा व एक नर घडिय़ाल हैं जो खुद अंडे देते हैं। इस बार करीब 130 अंडों में से 126 बच्चे पैदा हुए हैं।

60 दिन बाद अंडे से निकलते हैं बच्चे

मुख्य वन संरक्षक लुप्त प्राय परियोजना एपी सिन्हा ने बताया कि मादा घडिय़ाल मार्च व अप्रैल में अंडे देती है। इन्हें 30 से 35 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर रेत में दबाकर रखा जाता है। 60 से 62 दिन बाद अंडों से बच्चे निकलते हैं। उन्होंने बताया कि अब तक पांच हजार से अधिक घडिय़ाल के बच्चे तैयार किए गए हैं जो देश की विभिन्न नदियों के साथ-साथ अमेरिका, जापान, बांग्लादेश आदि भेजे जा चुके हैं

 

तीन साल के घडिय़ाल ही नदी में जाते हैं छोड़े

क्षेत्रीय वन अधिकारी टीपी सिंह ने बताया कि यहां पर घडिय़ालों को तीन साल की उम्र तक रखा जाता है। इसके बाद इन्हें नदी में छोड़ दिया जाता है। घडिय़ाल पुनर्वास केंद्र में इस दुर्लभ प्रजाति को संरक्षित कर उनकी संख्या बढ़ाई जा रही है।  

 

By Ashish Mishra