लखनऊ। '...क्या हिंदी के लेखक नए पाठकों की खोज में हैं?' जागरण संवादी के तीसरे सत्र में आज यह प्रश्न मंच पर उतरा तो कुछ ही देर में गरमागरम बहस बन कर भारतेंदु नाट्य अकादमी के थ्रस्ट थिएटर में मौजूद ऑडियंस तक बिखर गया। मंच पर लेखक भी अलग-अलग तेवर के थे। एक ओर पुरानी पीढ़ी के जाने-माने जासूसी उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक और ब्लॉगर निधीश त्यागी थे तो उनके मुकाबिल नई पीढ़ी के लेखकों की जमात में शुमार होने वाले विनीत कुमार और सत्या वैश्य मौजूद थे।

दिल्ली से आईं लेखिका व ब्लॉगर मनीषा पांडेय ने सवाल उठाया कि हिंदी का अधिकांश लेखन क्या स्वान्त: सुखाय के लिए लिखा जा रहा है। इस पर सुरेंद्र मोहन पाठक मुखर हो उठे। दो टूक बोले- स्वान्त: सुखाय लेखन नहीं होता..., इज्जत बचाने का पाखंड है यह। लेखन में पैसा नहीं तो सब बेकार। ऐसा न होता तो रॉयल्टी के पीछे लोग भाग न रहे होते। उनकी इस बात पर ऑडीटोरियम में जोर का ठहाका भी लगा कि कोई अहमक ही होगा जो पैसे पर निगाह रखे बिना लिखता होगा। 'मंडी में मीडिया' उपन्यास और अपने ब्लॉग्स से चर्चा में आए विनीत कुमार बोले- पाठकों की खोज की बात लेखकों पर एकतरफा प्रेम के आरोप जैसी है। दरअसल अब प्रकाशक ही डबल सिम वाले मोबाइल फोन की तरह ऐसा लेखक चाहते हैं, जिसके फेसबुक और ट्विटर पर ढेर सारे फॉलोअर्स हों। यानी वह लिखे भी और बिना प्रचार किए ही किताब बिकना भी शुरू हो जाए। विनीत ने सवाल उठाया कि हम वास्तव में पाठक तलाश रहे हैं या ग्र्राहक, ग्र्राहक तलाशने का काम प्रकाशक का है क्योंकि मैं बाजार के मंच पर खड़ा होकर नहीं अपने कमरे की स्टडी टेबल पर लिख रहा हूं।

बोकारो से आए सत्या वैश्य ने पाठकों को आयु वर्ग में बांटने का फार्मूला समझाया तो इस बायोलॉजिकल क्लासीफिकेशन पर नई बहस शुरू हो गई। सत्या का कहना था कि या तो 18 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में लोग किताबें पढ़ते हैं या फिर 35 के बाद। वह फिलहाल 18-25 आयु वर्ग के लिए लिख रहे हैं, जब परिपक्वता आएगी तब 35 के बाद वालों के लिए भी लिखने लगेंगे। इस पर विनीत ने असहमति जता दी। बोले, 18 साल का लड़का एक तरफ दिल्ली में दामिनी को बचाने के लिए जान पर खेल जाता है तो वहीं इसी उम्र का कोई और युवक आशनाई के फिल्मी गीत गुनगुनाता घूमता है। इसलिए आयु वर्ग से पाठकों की रुचि या पसंद को नहीं बांधा जा सकता। विनीत की इस बात पर सबने सहमति जताई कि हिंदी पाठकों को को लेकर लगाए जा रहे यह कयास बेमानी हैं, क्योंकि आज तक न तो ऐसी सोशियोलॉजी पर कोई रिसर्च हुआ है और न ही इसके प्रामाणिक आंकड़े हैं। ब्लॉगर निधीश ने भी इस पर सहमति जताई कि लिखे से ज्यादा लिखने वालों की चर्चा हो रही है जबकि वास्तव में सप्लाई एंड डिमांड का फार्मूला हिंदी लेखन पर लागू नहीं होता।

Posted By: Nawal Mishra

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