लखनऊ(जेएनएन)। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय (बीबीएयू) दो छात्र गुटों में हॉस्टल में रहने के विवाद में शनिवार को नया मोड़ सामने आ गया है। सिद्धार्थ छात्रावास में सभी वर्गों के छात्रों के रखे जाने की व्यवस्था है, इसके बावजूद विवि प्रशासन ने दबाव में आकर न सिर्फ नियम तोड़े, बल्कि एक जाति के छात्रों का हॉस्टल होने की अप्रत्यक्ष पैरवी की। जब विवाद बढ़ा तो विवि के जिम्मेदार मामले को सुलझाने के बजाय लीपापोती में लग गए।

वर्ष 2011-12 में आंबेडकर विवि के छात्रों की सुविधा के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 100 कमरों वाले सिद्धार्थ छात्रावास क निर्माण कराया था। एलॉटमेंट के बाद नियमों को दरकिनार कर जाति विशेष के दबाव में आकर विवि प्रशासन ने दूसरे वर्ग के छात्रों को इस आधार पर छात्रावास से बाहर कर दिया कि उन्हें वहां रहने का अधिकार नहीं है।

नियमों की पड़ताल शुरू

विवाद के बाद विवि द्वारा करीब पांच साल जिस आधार पर छात्रावास आवंटन किया गया था, उन नियमों को अब फिर से खंगाला जा रहा है। छात्रावास आवंटन समिति के सदस्य रहे एक शिक्षक ने बताया कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आवंटन के नियमों का पालन पहले किया गया था, लेकिन तत्कालीन कुलपति की ओर से नियमों की अनदेखी की गई, जिसका खामियाजा अब छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।

विवाद के चलते चौपट हुई पढ़ाई

बीबीएयू में छात्रावास में रहने को लेकर उठे मामले से परेशान मेधावी छात्रों ने भी अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी है। छात्रों ने विभागाध्यक्षों के माध्यम से कुलपति को प्रार्थना पत्र दिया है। इसमें शिक्षण कार्य सुचारू रूप से किए जाने की अपील की है। छात्रों का कहना है कि कुछ उपद्रवी छात्र जाति के नाम पर विवि का माहौल खराब कर कर रहे हैं। जाति के नाम पर रोजाना हो रहे विवाद के चलते उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

समाज कल्याण को नहीं मिला कोई पत्र

कुलपति प्रो. एनएमपी वर्मा ने छात्रावास आवंटन के नियमों की जानकारी के लिए समाज कल्याण विभाग को पत्र लिखे जाने की बात जरूर कर रहे हैं, लेकिन समाज कल्याण विभाग ऐसे किसी भी पत्र के मिलने से साफ इंकार कर रहा है। समाज कल्याण विभाग के अधिकारी ने बताया कि कुलपति की ओर से मेरे पास ऐसा कोई पत्र नहीं आया है।

कानून का उल्लंघन कर रहे जिम्मेदार

हाईकोर्ट सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस जकीउल्लाह खान का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 यानी 'समानता का अधिकार' हर किसी का मौलिक अधिकार है। इसके तहत सभी के प्रति समानता रखी जाए। किसी को भी जाति के आधार पर विभाजित न किया जाए। वहीं अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के उन्मूलन की बात कही गई है। अगर किसी व्यक्ति व संस्थान द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किया गया है तो वह दंडनीय अपराध है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार?

  • बीबीएयू डीन व स्टूडेंट वेलफेयर बीएस भदौरिया ने बताया कि बच्चों की मांग पर उन्हें अलग छात्रावास में शिफ्ट किया गया। यह सच है कि जिन छात्रों से परेशानी हो रही थी, उन पर कार्रवाई होनी चहिए थी। मगर उस वक्त जो ठीक लगा वो किया गया।
  • बीबीएयू कुलपति प्रो. एनएमपी वर्मा का कहना है कि हॉस्टल से छात्रों को हटाने का निर्णय प्रॉक्टर व डीएसडब्ल्यू के स्तर पर लिया गया था। किस आधार पर छात्रों को विभाजित किया गया, पूरे मामले की जांच कराई जाएगी। जो दोषी होगा, कार्रवाई होगी।

 

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