लखनऊ [जितेंद्र उपाध्याय]। बालवीरों की कहानी उन्हीं की जुबानी छोटी सी उम्र में ही जब इन पर मुसीबतें पड़ीं, या फिर परिस्थितियों ने हिम्मत दिखाने की मांग की, तब इन बच्चों ने जो हौसला दिखाया वह लोगों के लिए मिसाल है। इस बहादुरी के लिए न सिर्फ उन्हें राष्ट्रपति सम्मान मिला था, बल्कि दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड की शोभा बढ़ाकर प्रदेश और शहर का नाम रोशन किया था। आज इनमें से कोई किशोरावस्था तो कोई युवावस्था की दहलीज पर कदम रख चुका है, लेकिन उनकी हिम्मत का सफर आज भी जारी है। उनकी बहादुरी तात्कालिक नहीं थी। किसी के सामने सुनहरे भविष्य को पाने की चुनौतियां हैं तो कोई जीवन की जद्दोजहद से गुजर रहा है, लेकिन हौसले का साथ इनमें से किसी ने नहीं छोड़ा है। इन बाल बहादुरों के वर्तमान जीवन की रिपोर्ट...

 

जख्मों को भूल आइएएस बनने की राह पर रेशम

कानपुर रोड के ट्रांसपोर्टनगर स्थित बदालीखेड़ा निवासी रेशम फातिमा अपने चेहरे के जख्मों को भूल खुद को प्रशासनिक सेवा के लिए तैयार करने में लगी हैं। इन्हीं घावों से जन्मा आइएएस अधिकारी बनने का जुनून में उसने दिन-रात एक कर रखा है। आइएएस की प्री परीक्षा पहले अटेंप्ट में ही पास कर ली। दिल्ली में रेशम तैयारी कर रही है। नौ फरवरी 2015 को प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रानी लक्ष्मीबाई के नाम से शुरू होने वाला पहला अवार्ड रेशम को देकर उसके हौसले की दाद दी। 

एक फरवरी 2014 की शाम करीब सवा चार बजे थे कि एक दरिंदे ने बात न मानने पर उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया था। कार में सवार घायल फातिमा न केवल उनके चंगुल से भाग निकली, बल्कि रमाबाई पुलिस चौकी पर सूचना देकर अपने मामा को बुला लिया। पुलिस सूचना पर उसके मामा पहुंचते उससे पहले उसे लोकबंधु अस्पताल में भर्ती कराया गया। रेशम का कहना है कि मामा इरफान अहमद, नाना कबीर अहमद, नानी सरवर के प्यार और दुलार ने उस घटना को उसके जेहन से ही मिटा दिया। प्रतिभा ज्योति ने उसकी बहादुरी को पुस्तक (एसिड वाली लड़की) के रूप में प्रकाशित किया। पुस्तक का पूर्व लोकसभा अध्यक्ष नजमा हेपतुल्ला विमोचन किया था।

परिवार चला रहा दिव्यांग वीर

ट्रेन की चपेट में आने से एक बच्ची को बचाने वाले मो.रियाज अब परिवार चलाने की जंग लड़ रहे हैं। 17 वर्ष बीतने के बावजूद मो.रियाज के अंदर जिंदगी की जंग लडऩे का जज्बा कम नहीं हुआ है। उनका कहना है कि 2003 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जी ने मुझे सम्मानित किया और कहा था कि तुमने आठ वर्ष की आयु में ही जो कमाल कर दिखाया है वह काबिले तारीफ है। तुम खूब पढऩा और जब 18 वर्ष के हो जाओगे तो नौकरी भी दिलाई जाएगी। 2017 में इंटर की परीक्षा 85 प्रतिशत अंकों से पास की, लेकिन उम्र पूरी होने के बावजूद अभी तक किसी ने नौकरी देने की चिंता नहीं की। बच्ची को ट्रेन की चपेट से बचाते हुए खुद के दोनो हाथ और एक पैर गंवाने वाला यह बाल बहादुर युवा हो गया है। उसका कहना है कि सरकार ने भले ही मेरी तरफ से मुंह मोड़ लिया हो, लेकिन मेरे ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है। 

सड़क के किनारे मसाला बेच रहा उत्तम

महज छह साल की उम्र में मोहनलालगंज के मऊ निवासी उत्तम कुमार ने गांव में कुएं में गिरे एक बच्चे की जान बचाकर अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था। 2011 में उन्हें बहादुरी का न केवल सम्मान दिया गया बल्कि तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सम्मानित किया। आर्थिक तंगी से जूझ रहे उत्तम के भाई शिवा ने बताया कि पिता रूपचंद्र किसान हैं। उत्तम को इंजीनियर बनाकर अपने सपने को पूरा करने की चाहत आर्थिक तंगी के आगे धराशायी हो गई। एक निजी संस्थान से इंजीनियङ्क्षरग के लिए प्रवेश तो लिया, लेकिन फीस के अभाव में बीच में ही पढ़ाई छोडऩी पड़ी। उत्तम बताते हैं कि उस समय मैं कक्षा एक में पढ़ता था जब मैंने बहादुरी दिखाई थी। अब जब मैं समझदार हो गया हूं तो पता चल रहा है कि बहादुरी का जश्न एक दिन का होता है जो जिंदगी की जंग पर मरहम नहीं लगा सकता। मोहनलालगंज में पेट्रोल पंप के पास जमीन पर मसाला बेचकर जीवन की गाड़ी खींच रहा हूं, लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि सरकार ऐसे बाल वीरों के लिए कुछ करे, नहीं तो ऐसा ही होगा कि इस साल की परेड के लिए एक भी बाल वीर शहर से तो छोडिय़े, प्रदेश में भी ढूढ़े नहीं मिला।  

धर्म का ज्ञान दे रहे बाल बहादुर

अशोक चौधरी ने 51 बच्चों को करंट से बचाकर बहादुरी दिखाई और एक सप्ताह तक खुद कोमा में पड़े रहे। कानपुर रोड सेक्टर-डी निवासी अशोक चौधरी अब लोकबंधु अस्पताल के पास सिद्ध शक्तिपीठ श्री ज्वाला मां मंदिर के पीठाधीश्वर हैं और लोगों को धर्म का ज्ञान दे रहे हैं। वह बताते हैं कि मैं हिंदनगर के आरएमपी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ता था। स्कूल के पास ही 11केवी बिजली की लाइन गई थी। हल्की बारिश में छत भीग गई थी। इंटरवल था तो बच्चे छत पर खेल रहे थे, अचानक छत पर करंट उतर आया। बच्चे तड़पने लगे, उस समय सिर्फ मुझे साथियों की जान बचाने की चिंता थी। मैं तार पकड़ कर झूल गया और तार टूटने के साथ ही तीन मंजिल से नीचे जमीन में आ गया। हाथ-पैर की हंडिया टूटूने के साथ करंट लगने से मैं एक सप्ताह कोमा में रहा और छह महीने तक मैं चल नहीं पाया। 17 जनवरी 2002 को हुई इस घटना को याद करता हूं तो मुझे खुद पर गर्व महसूस होता है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम की ओर से बहादुरी का पुरस्कार मिला और प्रदेश सरकार की ओर से भी कई अवार्ड मिले, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला। एक अदद आवास देने का प्रदेश सरकार का वादा अभी तक पूरा नहीं हो सका है। अब मैं भगवान की सेवा में लगा हूं। इसी में सुख की अनुभूति होती है। 

42 साल में 62 बच्चे बने बहादुर

1978 से लेकर 2019 तक प्रदेश में 62 बच्चों ने अपनी बहादुरी के बल पर प्रदेश का नाम रोशन किया था। इनमें राजधानी के एलडीए कॉलोनी के अशोक कुमार चौधरी, तेलीबाग के रियाज अहमद, काकोरी के राहुल चौरसिया, कैंट की वंदना यादव, गोमतीनगर के सौमिक मिश्रा मोहनलालगंज के उत्तम कुमार, प्रीतिनगर के पवन कुमार, माल के मौसमी, बदाली खेड़ा की रेशम फातिमा का नाम भी शामिल है। इस बार प्रदेश से कोई बाल बहादुर नहीं चुना गया। 

 

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