लखनऊ [आशीष कुमार सिंह]। मां मैं तेरा बेटा बनकर आया हूं इस दुनिया में, लेकिन भारत मां का बेटा बनकर इस दुनिया से जाता हूं। मुझसे बार-बार कुछ मत पूछो मैं रोना नहीं चाहती। मैंने अपने बेटे को खुशी-खुशी विदा किया था। जम्मू-कश्मीर में हुई आतंकी घटना के बारे में अखबारों में पढ़कर सरोजनीनगर की रहने वाली शहीद की वृद्ध मां सावित्री का दिल दहल उठा।

वर्षो पूर्व हुई एक आतंकी घटना में अपने कमांडेंट बेटे को खोने वाली सावित्री की आंखें बरस पड़ीं। रुंधी आवाज में सावित्री बताती हैं कि मेरा बेटा विवेक बहुत बहादुर था। साथ में बैठे विवेक के बड़े भाई रंजीत सक्सेना और उनकी पत्नि की आंखों में आंसू छलक रहे थे। दिल में बेटे की मौत का गम दबा कर सावित्री कहती हैं, मेरा बेटा बहादुर था और देश के लिए शहीद हुआ था।

सरोजनीनगर के दरोगा खेड़ा स्थित कृष्णा लोक कॉलोनी निवासी अशोक चक्र एवं राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित शहीद विवेक सक्सेना का जन्म लखनऊ में 20 दिसंबर 1973 को हुआ था। विवेक के पिता स्व. रामस्वरूप सक्सेना एयर फोर्स में अधिकारी थे। विवेक ने पहले सीआरपीएफ की नौकरी ज्वाइन की। इसके बाद वर्ष 2001 में बीएसएफ में सहायक कमांडेंट के रूप में कार्यभार संभाला था। बड़े भाई रंजीत बताते हैं, विवेक ने 23 जुलाई 2001 में की कमांडो प्लाटून दो बटालियन का नेतृत्व करते हुए उग्रवादियों को मार गिराया था। उन्हें इस बहादुरी के लिए पुलिस मेडल शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।

आठ जनवरी 2003 की रात को मणिपुर के गांव में आतंकवादियों से मुठभेड़ हो गई। हथियारों से युक्त लगभग 250 आतंकवादियों पर जवाबी गोलाबारी भी की गई। आतंकवादियों की संख्या अधिक होने तथा भारी गोलाबारी के बावजूद विवेक ने बिना घबराए आक्रमण करते हुए दौड़-दौड़ कर अपने साथियों को प्रोत्साहित करते रहे और तीन आतंकवादी भी मार गिराए। उसी दौरान आतंकवादियों की गोलियों का शिकार कमांडेंट विवेक सक्सेना शहीद हो गए। विवेक के मझले भाई एयर फोर्स में अधिकारी के रूप में देश सेवा कर रहें हैं।

 

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