लखनऊ, अजय शुक्ला। बीते पचहत्तर साल के दौरान शहर ने अंग्रेजों की गुलामी के बंधन से मुक्त आजाद भारत की पहली सुबह देखी, प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री देखा, सियासी मुबाहिसे सुने, शामे अवध का जादू देखा, गंजिंग का लुत्फ महसूस किया, आबादी को संकरी गलियों से निकलकर शहर में फैलते देखा, कॉलोनियों का कल्चर देखा, परदेशियों को अपनी गोद में पनाह देते देखा, रिक्शे-तांगे, टमटम-बग्घी से लेकर गणोश छाप टेम्पो को धुआं उड़ाते देखा, विक्रम-ऑटो-ई रिक्शा का दौर देखा, खटारा सिटी बसों से एसी वोल्वो बसों की गुदाज सीटों का आनंद लेते देखा। सड़क के नीचे, बराबर और गगनचुंबी रेल पटरियों पर वातानुकूलित मेट्रो बेआवाज सरकते देखा। काठ की सीटों पर निकली कीलों के बीच पैंट फाड़ती कुर्सियों पर बैठकर श्वेत-श्याम सिनेमा देखने से लेकर मल्टीप्लेक्स की नर्म गद्दियों में पॉपकार्न के साथ थ्रीडी-फोरडी फिल्मों का आनंद लेते देखा। पूड़ी-कचौड़ी, दही-जलेबी, दूध-रबड़ी से लेकर चाइनीज, कॉन्टिनेंटल तक खानपान का दौर देखा ..और भी न जाने क्या-क्या देखा और जो कुछ भी देखा उसका गवाह बना दैनिक जागरण।

तब आपका जागरण कानपुर से छपकर लखनऊ आता था, लेकिन अलस्सुबह पूरी ताजगी परोसकर देश-दुनिया की खबर देता। यह वह दौर था जब अखबार में मूलत: सियासी चेतना और आपराधिक गतिविधियों की रिपोर्टिग होती थी। लॉटरी के रिजल्ट और टेंडर की नोटिसें छपती थीं। संपादकीय पेजों पर गंभीर विषयों पर लेख छपते थे और रविवारीय संस्करण में बच्चों व महिलाओं के साथ साहित्य की गंगा में गोते लगाने के शौकीनों के लिए सामग्री हुआ करती थी। अखबार मूलत: पढ़े-लिखे परिपक्व युवाओं व बुजुर्गो के पढ़ने की चीज हुआ करता था। यह वह दौर था जब लखनऊ शहर की सीमा सिस गोमती में चौक दुबग्गा से शुरू होकर हजरतगंज में ठहर जाया करती थी। पश्चिमी और पूर्वी किनारों की सीमा के आगे-पीछे बिल्डिंगें और पार्क आउटस्कर्ट का अहसास कराते थे। दक्षिण में आलमबाग आखिरी आबादी थी और कृष्णानगर को शहर का बाहरी हिस्सा माना जाता था। ट्रांसगोमती में डालीगंज के बाद अलीगंज और निशातगंज के छितराये मुहल्ले हुए करते थे। बादशाहनगर रेलवे स्टेशन के बाद आबादी ठहर जाया करती थी। आज का व्यस्ततम पॉलीटेक्निक चौराहा तब गाजीपुर चौराहा कहलाता था और आज जहां मेट्रो लाइन पालीटेक्निक ओवरब्रिज के ऊपर से गुजरते हुए मुंशीपुलिया की तरफ बढ़ती है, वहां यूकेलिप्टस के पेड़ों के बीच से पतली सड़क गुजरते हुए मुंशीपुलिया पहुंचती थी। इसी दौर में 19 अक्टूबर, 1979 में दैनिक जागरण के लखनऊ से छपने की शुरुआत हुई। जनपथ के बगल रानी रामकुमार भार्गव की बिल्डिंग में प्रेस और दफ्तर की शुरुआत हुई। इसे संयोग कहें या दैवयोग कि लखनऊ में जागरण उसी जमीन पर शुरू हुआ जिसे मुंशी नवलकिशोर ने लखनऊ में एशिया का सबसे बड़ा छापाखाना दिया था।

जागरण ने लखनऊ में परंपरागत पत्रकारिता से हटकर शुरुआत की। यह वह पहला अखबार था जिसने राजनीति, अपराध और लॉटरी से आगे बढ़कर खुद को सीधे समाज से जोड़ा। सियासी हवाई बहसों पर तरजीह देते हुए जनप्रतिनिधियों को आम शहरियों की समस्याओं से रूबरू कराते हुए जागरण को आईना बनाया। जागरण ने राजनेताओं और अफसरों के इर्द-गिर्द घूमने के बजाय सीधे समाज से रिश्ता जोड़ा और पत्र ही नहीं मित्र बनकर उनके रोजमर्रा के सवालों के हल खोजने में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हुआ।

नागरिक सुविधाओं और तेजी से बढ़ते शहर की जरूरतों की ओर अफसरों और जनप्रतिनिधियों का ध्यान आकृष्ट कराने में जागरण सबसे आगे रहा। चाहे व सड़कों की जरूरत रही हो या शहरी यातायात को वक्त की जरूरत के साथ आधुनिक स्वरूप देने की, जागरण ने आगे बढ़कर शहर का नेतृत्व किया। चिकित्सा, विज्ञान, शिक्षा, कला और रंगकर्म को नियमित बीट के रूप में विकसित कर जनोपयोगी खबरें प्रकाशित करनी शुरू की। जब अखबारों पर यह तोहमत जड़ी जा रही थी कि वह नकारात्मक खबरें ही परोसते हैं, तब जागरण ने सरोकारों से रिश्ता जोड़ा और नारी सशक्तीकरण, सुशिक्षित समाज, स्वस्थ समाज, गरीबी उन्मूलन, जनसंख्या नियोजन, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्र की सकारात्मक खबरों के जरिये समाज के जागरूक तबके और युवा वर्ग को साथ जोड़ा। जागरण की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि उसने हर तबके को जोड़ देते हुए संपूर्ण समाज को राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़कर सभी को एकता के सूत्र में पिरोया।

इसमें साथ दिया तहजीब के इस शहर के प्रबुद्ध पाठकों ने। लखनऊ में जब अखबार शुरू हुआ था तब इसकी प्रसार संख्या दस हजार थी, लेकिन पाठकों के प्यार के कारण ही जिस रफ्तार से शहर की जनसंख्या बढ़ी उससे तीन गुनी गति से जागरण की प्रसार संख्या बढ़ी और जागरण सालों साल से देश ही नहीं शहर का भी नंबर एक अखबार बना हुआ है। यह सफर अभी जारी है ..।

Posted By: Anurag Gupta