लखनऊ, [दीप चक्रवर्ती]। किस्साबयानी का अपना लुत्फ होता है। कहानी जब राजा-रानी की हो, उस पर भी चंद्रकांता की तो कहने ही क्या। इतना ही नहीं, इसमें लखनवी गप का तड़का, सामयिक राजनीतिक परिदृश्य पर तंज और हिमांशु बाजपेयी का अंदाज-ए-बयां हो तो, श्रोता खुद-ब-खुद अपनी सीट पर मुग्ध से बैठे रह जाते हैं। 

अंतिम सत्र में शहर के ही हिमांशु बाजपेयी और दिल्ली की रजनी चांदीवाल ने 'दास्मानगोई: दास्तान चंद्रकांता' की कहानी का एक दिलचस्प टुकड़ा सुनाया। हिमांशु का अंदाज देखिए कि माइक टेस्ट करने के लिए भी हेलो-हेलो नहीं की जगह, एक शेर पढ़ते हैं। नतीजा शो शुरू होने से पहले ही उन्हें श्रोताओं की तालियां नसीब होती हैं। फिर अपने अजीज दोस्त स्वर्गीय अंकित चड्ढा को वे यह प्रस्तुति समर्पित करते हैं और कारवां आगे बढ़ता है। 

इस प्रस्तुति में हिमांशु ने देवकी नंदन खत्री के प्रसिद्ध उपन्यास के एक टुकड़े को उठाया, उसमें चार अय्यार चपला, चंपा, अहमद और नासिम को मुख्य पात्र के रूप में रखा। इन्हीं चारों की कारगुजारियों पर पूरा किस्सा बुना गया है, जिनका आपसी द्वंद्व लोगों को हंसा जाता है। चंद्रकांता जो राजकुमार वीरेंद्र सिंह से प्रेम करती है, अपने महल के बाग में चंपा और चपला के साथ टहल रही है। तभी चपला को शक होता है कि चंपा कुछ असहज लग रही है। वह चालाकी से उसे बुकनी सुंघाकर बेहोश कर देती है और उसका छद्म रूप उतार देती है। पाती है कि वह तो क्रूर सिंह का अय्यार नाजिम है। उसे पकड़कर वे उसे कोड़े से मारती हैं। इस बीच वीरेंद्र सिंह का मित्र तेज सिंह युवती का वेश धारण कर चंद्रकांता को वीरेंद्र सिंह की चिट्ठी देने आता है। चिट्ठी देकर जब वह वापस जाता है तो उसे अहमद और नाजिम मिलते हैं। तेज सिंह चालाकी से अहमद को बंदी बनाकर ले जाता है और नाजिम सिर पटकता रह जाता है। यहीं पर दास्तां समाप्त होती है। अंत में हिमांशु एक बार फिर अंकित को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

Posted By: Anurag Gupta

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप