प्रो. मनुका खन्ना। जनता की संप्रभुता लोकतंत्र की नींव है। नागरिकों की सकारात्मक सक्रिय भागीदारी ही इसकी सफलता सुनिश्चित करती है। चुनाव का समय निकट आते ही विकास और समृद्धि बनाम लोकलुभावन नीति के बीच का विवाद खुलकर सामने आ जाता है। अधिकतर सभी तर्कसंगत निर्णय विकास के पक्ष में लिए जाते हैं किंतु ‘विकास’ अपने आप में एक जटिल और अस्पष्ट सिद्धान्त है जो युग और काल के साथ नए आयामों को साथ लेकर आता है। एक समय था जब विकास को केवल आर्थिक समृद्धि और औद्योगिकीकरण के साथ जोड़ा जाता था। आज विकास को आर्थिक समृद्धि के अतिरिक्त सामाजिक उत्थान और मानवीय सुरक्षा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के विकास कार्यक्रम ने लोगों के लंबे व स्वस्थ जीवन, ज्ञान प्राप्ति तथा जीवन शैली को विकास का हिस्सा माना है। इसके लिए ऐसी नीतियां अपनानी होंगी जो समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से अपना लाभ पहुंचा सकें।

भारत के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-123 किसी राजनीतिक दल को अपने घोषणापत्र में लोकलुभावने वादे करने से प्रतिबंधित नहीं करती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट कहता रहा है कि राजनीतिक दलों द्वारा दिए जाने वाले प्रलोभन स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की जड़ें हिला देते हैं। प्रश्न यह उठता है कि कौन सी योजनाएं प्रलोभन मानी जाएं और किन को राज्य के विकास में सहायक कहा जाए। राज्य की परिकल्पनाओं और समाज की महत्वकांक्षाओं के आधार पर समय के साथ विकास के नारे भी बदले हैं। पिछली सदी में रोटी, कपड़ा और मकान प्रबल नारा था। इस सदी में बिजली, पानी और सड़क की जरूरत सामने आई। अब इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस कड़ी में जुड़ गए हैं। बदलते हालात में राजनीतिक दलों को जनता की बदलती मांग को समझना होगा। फिलहाल पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। महामारी के कारण अनिश्चितता का माहौल है। इस अनिश्चितता की स्थिति में भावी सरकारों से आशाएं भी बहुत हैं। ऐसे में हर राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र और बयानों से जनता का समर्थन प्राप्त करने के प्रयास में है। यह भी सोचना होगा कि मौजूदा हालात में जब सब कुछ आनलाइन हो रहा है, तब छात्र-छात्रओं को दिए जाने वाले स्मार्टफोन व टेबलेट प्रलोभन कहे जाएं या विकास के मार्ग पर एक कदम? किसानों की जरूरत के लिए उनके खाते में सहायता राशि भेजना या श्रम कार्ड के माध्यम से एक वर्ग को आर्थिक सहायता देना और आयुष्मान भारत के माध्यम से लोगों को इलाज में सक्षम बनाना भी ऐसे ही कदम हैं।

प्रलोभन और विकास के लिए जरूरी कदम के बीच बारीक लकीर है। राजनीतिक दलों के साथ-साथ जनता को भी इस फर्क को समझना होगा। साथ ही यह भी सोचना होगा कि वादे पूरे करने के लिए राज्य सरकार के पास माध्यम क्या होगा। इस समय ज्यादातर राज्यों पर कर्ज है। यह कहीं न कहीं राज्यों के विकास में बाधक होगा। एक विमर्श इस बात पर भी होता है कि किसानों का कर्ज माफ करने या उन्हें कर्ज चुकाने में सक्षम बनाने में से कौन सी नीति को उचित माना जाए? चुनावों के आसपास ऐसे कई सवाल सतह पर आ जाते हैं। राजनीतिक दलों को जिम्मेदार बनने की जरूरत है। केवल मुफ्त के उपहारों का लालच देकर चुनाव जीतने का प्रयास उचित नहीं है। बेहतर तरीका होगा कि पार्टियां चुनावी वादे करते समय इस बात का खाका भी पेश करें कि उन वादों को पूरा करने के लिए उनके पास रणनीति क्या है? इससे हम बेहतर प्रशासन और समाज की ओर बढ़ सकेंगे। हम मानव विकास के उन पैमानों पर आगे बढ़ेंगे, जिनसे सभी का जीवन समृद्ध एवं सुखी हो सकेगा। जनता को भी चुनाव के समय राजनीतिक दलों के वादों की व्यवहार्यता पर विचार करना चाहिए। सतर्क मतदाता ही श्रेष्ठ लोकतंत्र का वाहक बन सकता है।

[विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय]

Edited By: Sanjay Pokhriyal