लखनऊ [अवनीश त्यागी]। उत्तर प्रदेश में वित्तीय संकट झेल रही चीनी मिलें यदि प्रचुर मात्रा में एथनॉल का उत्पादन कर रही होतीं तो आज उनकी यह स्थिति न होती। चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने का सीधा लाभ उन गन्ना किसानों को मिलता, जिनका चार हजार करोड़ से अधिक गन्ना मूल्य बकाया मिलों पर है। किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य हासिल करने में भी एथनॉल उत्पादन बढ़ाओ फार्मूला कारगर होगा। यह हरित ईंधन है और पेट्रोल में इसका मिश्रण पर्यावरण प्रदूषण भी कम करेगा। इससे विदेशी मुद्रा में जो बचत होगी, वह अतिरिक्त लाभ।

बायो ईंधन एथनॉल को पेट्रोल में मिश्रित कर प्रयोग किया जाता है। सरकार ने 15 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित करने की इजाजत दे रखी है, लेकिन शायद ही कोई राज्य इतना एथनॉल मिश्रित करता हो। उत्तर प्रदेश में 9.5 प्रतिशत तक एथनॉल मिश्रित किया जा रहा है, जो देश में सर्वाधिक है। एथनॉल मिश्रण से वाहनों के इंजन की उम्र बढ़ने के साथ हवाओं में सल्फर और कार्बन का खतरा भी घटता है। पर्यावरणविद् रमणकांत कहते हैं कि तेजी से बढ़ती वाहनों की संख्या से नगरीय क्षेत्रों में आबोहवा जहरीली होती जा रही है। एथनॉल का प्रयोग बढ़ेगा तो यह संकट भी कम होगा।

उत्तर प्रदेश की 121 चीनी मिलों में से 58 में एथनॉल उत्पादन हो रहा है। एक दर्जन से अधिक मिलों में एथनॉल संयंत्र शुरू होने का कार्य अंतिम चरण में है। एक क्विंटल शीरे से 22.50 लीटर एथनॉल तैयार होता है। आरक्षित शीरा भी मिलों को मिलने तो लगभग दो लाख किलोलीटर एथनॉल अतिरिक्त बनने लगेगा। इससे चीनी मिलों के हालात सुधरेंगे। किसानों को भी गन्ना मूल्य भुगतान में आसानी होगी। गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग मंत्री सुरेश राणा का कहना है कि सहकारी मिलों का वरीयता के आधार पर उच्चीकरण कराया जा रहा है। छह बंद डिस्टलरी इस वर्ष आरंभ हो जाएंगी। कई अन्य मिलों में एथनॉल के साथ कोजन प्लांट भी स्थापित कराए जा रहे हैं।

मुश्किल में सहकारी व एकल मिलें

एथनॉल उत्पादन की इकाइयां प्रदेश की अधिकतर सहकारी व एकल चीनी मिलों में नहीं है। प्रदेश में 24 सहकारी मिलें है। इक्का दुक्का को छोड़ अधिकतर की स्थिति संतोषजनक नहीं है। मिलें पुरानी मशीनों और तकनीकी पर चलाए जाने के कारण घाटे का सौदा बनी हैं। शीरा आरक्षण कोटा बढ़ने का अधिक नुकसान भी उन मिलों को ही है जहां एथनॉल इकाई नहीं है। उनको सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का लाभ भी नहीं मिल पाता जिसमें मिलों को अपना एथनॉल बनाने के लिए जरूरी शीरे का इस्तेमाल करने के बाद बचे हुए शीरे पर ही आरक्षण लागू होने की व्यवस्था है।

गन्ना क्षेत्र घटाने की जरूरत न होगी

गत दो वर्ष से गन्ने की रिकार्ड पैदावार सरकार के लिए सरदर्द बनी है। किसानों का गन्ना खपाने के लिए कई चीनी मिलों में जून तक पेराई करानी पड़ रही है। कैश क्राप होने के कारण किसानों का गन्ना मोह कम नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2018-19 में गन्ना बोआई क्षेत्रफल करीब 26.79 लाख हेक्टेयर था। मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव के किसान राजीव बालियान का कहना है कि गन्ने की फसल किसानों की मजबूरी बन चुकी है। इसके अलावा कोई फसल ऐसी नहीं जो कम खर्च व मेहनत में इतना लाभ दे सके। चीनी मिलों के साथ गुड़ और खांडसारी उद्योग को भी प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इसके अलावा सभी मिलों में एथनॉल और कोजन प्लांट लग जाए तो किसानों से गन्ना बोआई कम करने जैसी अपील भी नहीं करनी पड़ेगी।

पूर्वांचल फिर बन सकता है चीनी का कटोरा

पूर्वांचल के किसानों की खुशहाली गायब होने का एक प्रमुख कारण वहां चीनी मिलों का बंद होना भी है। योगी सरकार के कार्यकाल में इस ओर ध्यान दिया गया तो वहां किसानों ने फिर गन्ना बोआई शुरू की है। गन्ना विभाग की रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष गन्ना क्षेत्रफल में सर्वाधिक वृद्धि गोरखपुर जिले में 43.53 प्रतिशत हुई है। इसके अलावा देवरिया में 18.39 प्रतिशत और आजमगढ़ में 10.93 फीसद गन्ना क्षेत्रफल बढ़ा है। किसान देवप्रकाश राय का कहना है कि सरकार की ईमानदार कोशिशें जारी रहेगी तो पूर्वांचल में भी फिर से बहार आएगी।

प्रमुख एथनॉल उत्पादक मिलें

मिल                                        उत्पादन क्षमता

धामपुर मिल बिजनौर                       875

बलरामपुर मिल बलरामपुर                560

त्रिवेणी साबितगढ़ बुलंदशहर              528

जुबिलेंट मिल गजरौला अमरोहा          495

डीएसएन असमौली-संभल                 495

डीएससीएल हरियांवा हरदोई             495

बजाज मिल गांगनौली सहारनपुर        480

बजाज मिल रूदौली बस्ती                480

बजाज मिल खंभारखेड़ा खीरी            480

त्रिवेणी मिल्स, मुजफ्फरनगर              480

(एथनॉल उत्पादन लाख किलोलीटर प्रतिवर्ष में) 

Posted By: Umesh Tiwari

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