लखनऊ, राजीव दीक्षित। मशहूर लेखिका और स्तंभकार शोभा डे ने शुक्रवार को कहा कि फिल्म पत्रकारिता अब पीआर जर्नलिज्म में तब्दील हो चुकी है। फिल्म अभिनेता या अभिनेत्रियां अखबारों और पत्रिकाओं को तभी इंटरव्यू देने के लिए राजी होते हैं, जब वे उनकी फिल्म को प्रमोट करें। लंबे अरसे तक फिल्म पत्रकारिता से जुड़ी रहीं शोभा शुक्रवार को दैनिक जागरण 'संवादी' में अपने जीवन के पन्नों को श्रोताओं से साझा कर रही थीं। 'पॉलिटिकली इनकरेक्ट' नामक इस सत्र में उनसे सवाल कर रहे थे साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ी संस्था टीमवर्क आर्ट्स के प्रबंध निदेशक संजय के. रॉय।

तब अभिताभ बच्चन से फोन पर हो जाती थी बात

 गुजरे चार दशकों के दौरान फिल्म पत्रकारिता में आये बदलावों के सवाल पर शोभा ने कहा कि सत्तर और अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना जैसे फिल्मी सितारों से टेलीफोन पर बात करना आसान होता था। आज के दौर में अभिनेताओं तक पहुंचने के लिए कई फिल्टर्स से गुजरना पड़ता है। इस दौर के फिल्मी सितारों के पास सेक्रेटरियों की फौज होती है और बाउंसर्स भी। आजकल फिल्म अभिनेता समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के बजाय टीवी शो में शिरकत करने को अधिक अहमियत देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके जरिये वे ज्यादा लोगों तक पहुंच बना सकेंगे। 

मीटू अभियान की सार्थकता बनी रहने दें

मीटू अभियान को लेकर बीते दिनों अपने बयान के कारण सुर्खियों में आयीं शोभा ने कहा कि यह अभियान जब परवान चढ़ा तो इसे लेकर लोगों में गलतफहमियां थीं। लोगों को लगता था कि यह उन औरतों की मुहिम है जो मर्दों से नफरत करती हैं। इस आधार पर उसे उपेक्षित करने की कोशिश भी हुई थी। बकौल शोभा, उनका मानना है कि महिलाओं के दर्द से जुड़े इस अभियान को सनसनीखेज और स्कैंडल का रूप नहीं देना चाहिए। यदि किसी महिला को लगता है कि बीस साल पहले उसके साथ जो कुछ हुआ, यदि वह उसे आज भी साबित कर पाती है तो समाज उसके साथ खड़ा होगा, तो यह मीटू अभियान की सार्थकता है। इस अभियान को इसलिए सस्ता नहीं बनाना चाहिए कि कुछ लोग इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। एक और सवाल के जवाब में उन्होंने साफगोई से कहा कि मीटू के संदर्भ में उनके पास खुद बताने के लिए कुछ भी नहीं है क्योंकि उनके साथ ऐसा कुछ भी घटित नहीं हुआ। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तमाम अन्य औरतों के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा। 

अच्छे लेखक के लिए अच्छा रीडर होना जरूरी

 एक सवाल के जवाब में शोभा ने कहा कि अच्छा लेखक होने के लिए अच्छा रीडर होना बेहद जरूरी है। आप जितना जल्दी किताबें पढऩा शुरू कर देंगे, आपके लिए यह उतना ही फायदेमंद साबित होगा। उन्होंने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती रही कि उनके पिता ने बचपन में उन्हें खिलौने दिलवाने की बजाय अच्छी किताबें मुहैया करायीं। किताबों को उन्होंने तल्लीनता से और डूबकर पढऩे की सलाह दी। 

ट्रोलिंग के बावजूद सोशल मीडिया लोकतांत्रिक

यह पूछने पर कि सोशल मीडिया अब विचार विनिमय और सूचनाओं के आदान-प्रदान के अपने मकसद से भटक कर ट्रोलिंग का जरिया बन गया है, शोभा ने कहा कि यह इस पर निर्भर करता है कि आप किसे अहमियत देते हैं। ट्रोलिंग के साथ यह सूचनाओं के आदान-प्रदान का भी जरिया है। यदि आप सूचनाओं और विचार विनिमय में रुचि लेते हैं तो उसका उस रूप में इस्तेमाल करें, ट्रोल करने वालों को नजरअंदाज करें। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के नियम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट्स से टूट रहे हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया बेहद लोकतांत्रिक माध्यम है। 

लखनऊ तो है चुंबक जैसा

सवाल-जवाब के सिलसिले के जरिये अपने अनुभवों और विचारों को साझा करने वाली शोभा लखनऊ की शान में कसीदे कढऩे से नहीं चूकीं। कहा कि लखनऊ तो एक खास चुंबक जैसा है। यहां के चिकनकारी और खानपान की तो वे कायल रही हैं, यहां की शीरीं जुबान भी उन्हेंं बहुत सुहाती है। यह भी बताया कि आज वह अपने पति दिलीप डे के साथ उनके पुराने स्कूल ला मार्टीनियर गई थीं। वहां पहुंचकर जब उन्होंने गेटकीपर से अंदर जाने की इजाजत मांगी तो उसने शान से कहा 'अखिलेश (पूर्व मुख्यमंत्री) के बच्चे भी यहां पढ़ते हैं और उन्हें भी हम इसी तरह रोकते हैं।'

 

Posted By: Anurag Gupta

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