लखनऊ, जेएनएन। बलिया से लगातार सांसद रहने के बाद देश के प्रधानमंत्री बने स्व. चंद्रशेखर के परिवार से दूरी समाजवादी पार्टी को काफी भारी पड़ सकती है। स्वर्गीय चंद्रशेखर के पुत्र व राज्यसभा सदस्य नीरज शेखर ने कल समाजवादी पार्टी के साथ ही राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है। इससे लग रहे है कि पूर्वांचल के बड़े गढ़ से समाजवादी पार्टी मेंं अभी सब सामान्य नहीं है। 

समाजवादी पार्टी में बसपा से गठबंधन को लेकर पनपा असंतोष अभी कायम है। इसके साथ ही टिकटों के बंटवारे से गहराया गुस्सा भी कम नहीं हुआ। पार्टी में चंद्रशेखर परिवार से वर्षो पुराना नाता टूट जाने की चिंता ज्यादा है। इससे समाजवादी आंदोलन की धार कुंद होने और पूर्वांचल में जनाधार घटने का डर भी सता रहा है।

नीरज शेखर का समाजवादी पार्टी को छोड़ना पार्टी के लिए पूर्वांचल में एक बड़ा झटका की तरह देखा जा रहा है। बता दें किअगले कुछ महीने में ही प्रदेश में 12 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होने वाले है। प्रदेश में बसपा से गठबंधन टूटने के बाद अखिलेश यादव को अकेले लड़ कर नेतृत्व क्षमता दिखानी है। जिसका प्रभाव वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव मेें भी दिखेगा। सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद अखिलेश यादव पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने व समाजवादी दिग्गजों को संभालने में नाकाम रहे हैं। गठबंधन में चुनाव लड़ने के प्रयोग भी फेल सिद्ध हुए हैं। कांग्रेस से गठबंधन में वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में किरकिरी करा चुके अखिलेश के लिए बसपा से गठजोड़ करके लोकसभा चुनाव लड़ना आत्मघाती साबित हुआ।

नीरज शेखर की नाराजगी की नींव भी बसपा से गठबंधन के समय ही पड़ गयी थी। नीरज शेखर पुश्तैनी संसदीय क्षेत्र बलिया से खुद या अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते थे। अखिलेश की ओर से पूरा आश्वासन भी दे दिया गया था परंतु ऐन वक्त पर इनकार करने से नीरज आहत हुए। उनकी नाराजगी इसलिए अधिक थी कि बलिया का टिकट बसपा के इशारे पर दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर के राज्यसभा से इस्तीफा देने की खबर सोमवार को आई तो उन सारी अटकलों पर विराम लग गया, जिसके कयास लोकसभा चुनाव के समय से ही लगाया जा रहे थे। माना जा रहा है कि वे जल्द ही भाजपा का दामन थाम सकते हैं। लोकसभा चुनाव में बलिया की सीट सपा-बसपा बंटवारे में समाजवादी पार्टी के खाते में थी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की इस परंपरागत सीट से नीरज शेखर का लड़ना तय माना जा रहा था। वह राज्यसभा सदस्य भी थे, लिहाजा माना जा रहा था कि समाजवादी पार्टी अपनी एक सीट कम नहीं करेगी। ऐसे में नीरज शेखर की पत्नी डॉ. सुषमा शेखर को उम्मीदवार बनाने पर मंथन हो रहा था। इसे लेकर लंबे समय तक उम्मीदवार की घोषणा भी सपा नहीं कर पा रही थी। डॉ. सुषमा शेखर का नाम तय भी हो गया था, लेकिन ऐन मौके पर ऐसा कुछ राजनीतिक पेंच उलझा कि चंद्रशेखर की विरासत पर विराम लगाते हुए सपा ने यहां से सनातन पांडे को उम्मीदवार बना दिया। 

उल्लेखनीय है कि चंद्रशेखर समर्थकों का एक बड़ा खेमा विधान परिषद सदस्य यशवंत सिंह के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी से पहले ही अलग हो चुका है। जिसके चलते ही अब चंद्रशेखर जयंती व पुण्यतिथि पर होने वाले कार्यक्रमों में समाजवादी नेता काफी कम और भाजपा कार्यकर्ता अधिक नजर आते हैं। नीरज के जाने से समाजवादी पार्टी का क्षत्रिय वोटों का समीकरण भी गड़बड़ाएगा। टिकट कटने से नीरज शेखर के समर्थकों में आक्रोश था और इसका असर चुनाव पर भी पड़ा। खुद नीरज ने न सिर्फ चुनाव से दूरी बनाए रखी, बल्कि अखिलेश यादव की बलिया में हुई जनसभा में भी शामिल नहीं हुए। उसके बाद से यह तय माना जा रहा था कि नीरज व सपा का रिश्ता अब लम्बा नहीं चलने वाला। 

संभाली थी पिता की विरासत 

बलिया पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की परंपरागत सीट रही। 2007 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में नीरज शेखर को समाजवादी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया और पहली बार सांसद बने। इसके बाद 2009 के आम चुनाव में भी नीरज ने सपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और दूसरी बार सांसद बने। 2014 के लोकसभा चुनाव में बलिया की सीट पहली बार मोदी लहर में भाजपा के खाते में चली गयी। इसके बाद भी समाजवादी पार्टी ने चंद्रशेखर से अपने रिश्ते को मजबूती देते हुए नीरज शेखर को राज्यसभा सदस्य बनाया।

पूर्वांचल में भाजपा होगी मजबूत

नीरज शेखर के इस्तीफे से भाजपा की जड़ें न केवल पूर्वांचल में मजबूत होंगी वरन राज्यसभा के भीतर सपा की ताकत घटने का लाभ भी उसे मिलेगा। सूत्रों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेता अभी भाजपा नेतृत्व के संपर्क में हैं।

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Posted By: Umesh Tiwari