लखनऊ [शोभित श्रीवास्तव]। लखनऊ और गाजियाबाद को छोड़ दें तो यह दृश्य किसी भी आरटीओ व एआरटीओ दफ्तर का हो सकता है। वाहनों की फिटनेस जांच के लिए लाइनें लगी हैं। फिटनेस पिट के ऊपर मिनटों में वाहन चढ़ाए जाते हैं, झटपट छह फोटो खिंची, अधिकारी ने भरपूर निगाह से वाहन को देखा और मिनटों में जांच पूरी। कुछ तो बिना देखे ही कागजों में पास हो गए।

15 वर्ष पुराने वाहनों से 50 प्रतिशत दुर्घटनाएं 

वाहनों की खराब सेहत भी दुर्घटना का एक बड़ा कारण है। वाहनों की फिटनेस कितनी महत्वपूर्ण होती है इसका अंदाजा पुराने वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं से लगाया जा सकता है। ट्रैफिक पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 50 प्रतिशत दुर्घटनाएं 15 वर्ष पुराने वाहनों से हो रही हैं। 52 प्रतिशत की मृत्यु का कारण इन्हीं पुराने वाहनों से हो रही दुर्घटनाएं हैं। पांच वर्ष तक के वाहनों से केवल 17 प्रतिशत दुर्घटनाएं हो रही है। पांच से 10 वर्ष पुराने वाहनों से 16 प्रतिशत व 10 से 15 वर्ष पुराने वाहनों से भी करीब 17 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं।

वाहनों की आटोमेटिक जांच के केवल दो केंद्र

वाहनों की फिटनेस जांच के लिए प्रदेश में सिर्फ दो ही आटोमेटेड स्टेशन हैं। एक लखनऊ में और एक गाजियाबाद में। बाकी जगह आंखों से देखकर ही फिटनेस जांचने का काम चल रहा है। व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करने से पहले वाहन में करीब 18 से 20 प्रकार की जांच जरूरी होती है किंतु 73 जिलों में आंख से देखकर ही सर्टीफिकेट दिया जाता है।

वाहन जांचने के लिए मूलभूत सुविधाएं तक नहीं

व्यावसायिक वाहनों को शुरुआती आठ वर्ष तक हर दो-दो वर्ष में फिटनेस जांच करानी होती है। आठ वर्ष बाद प्रत्येक वर्ष फिटनेस जांच होती है। प्राइवेट वाहनों की फिटनेस 15 वर्ष के लिए मान्य होती है। व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस प्रमाण पत्र जारी करने से पहले वाहन में करीब 18 से 20 प्रकार की जांच जरूरी होती है किंतु आरटीओ व एआरटीओ कार्यालय में वाहन जांचने के लिए मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।

हर दिन तीन हजार से अधिक वाहनों की होती है जांच

उत्तर प्रदेश में हर दिन तीन हजार से अधिक वाहनों की फिटनेस जांच होती है। आरटीओ व एआरटीओ कार्यालय में वाहनों को पास कराने के लिए दलालों का बड़ा गिरोह काम करता है। यह अधिकारियों को रिश्वत देकर वाहनों की फिटनेस आसानी से करा लेते हैं। एयरबैग जांचने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है।

आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन में 20 प्रतिशत वाहन हो रहे फेल

लखनऊ और गाजियाबाद में लगे वाहनों के आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन में हर दिन करीब 20 प्रतिशत वाहन जांच में फेल हो जा रहे हैं। चूंकि यहां जांच मशीनों से होती है इसलिए जो भी वाहन मानक के अनुरूप नहीं होते हैं वह फेल हो जाते हैं। ज्यादातर वाहन प्रदूषण, स्पीड गवर्नर (गति नियंत्रित करने का यंत्र) व लाइट की जांच में फेल हो जाते हैं।

वाहनों में इनकी होती है जांच

  • इंजन की जांच
  • हार्न की आवाज
  • प्रदूषण
  • स्पीडोमीटर व स्पीड गवर्नर
  • सस्पेंशन सिस्टम
  • ब्रेक सिस्टम
  • वाहन की नीचे से पूरी जांच करना
  • वाहन का लीकेज
  • हेड लाइट, अपर व डिपर, ब्रेक लाइट
  • व्हील अलाइनमेंट
  • वाइपर, इंडीकेटर
  • रिफ्लेक्टिव टेप
  • साइड मिरर

युद्ध स्तर पर स्थापित हों आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन

परिवहन विभाग में 34 वर्षों की सेवा पूरी करने वाले विशेष सचिव परिवहन के पद से रिटायर हुए अरविंद कुमार पाण्डेय कहते हैं कि सुरक्षित यातायात के लिए वाहनों की फिटनेस बेहद जरूरी है। इसके लिए सरकार को युद्ध स्तर पर आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन बनाने होंगे। इसे रोड सेफ्टी फंड से बनवाया जा सकता है, क्योंकि मैनुअल जांच में वैज्ञानिकता नहीं है। मशीनों से जांच में ब्रेकिंग सिस्टम से लेकर हर एक चीज की जांच पारदर्शी तरीके से हो जाती है।

सभी जिलों में आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन हो रहे स्थापित

प्रमुख सचिव परिवहन एल. वेंकटेश्वर लू ने बताया कि अभी तो लखनऊ और गाजियाबाद छोड़कर हर जिले में मैनुअल जांच ही हो रही है। अब सरकार ने प्रत्येक जिले में पीपीपी माडल पर आटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन स्थापित करने का निर्णय लिया है। जल्द ही इसके लिए टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे। इससे वाहनों की फिटनेस जांच में अनियमितता पर रोक लगेगी और वाहनों की जांच पारदर्शी तरीके से हो सकेगी।

वाहनों से सड़क हादसे (2021)

  • वाहनों की उम्र - दुर्घटनाएं - मृतक
  • पांच वर्ष से कम - 6528 - 3529
  • पांच से 10 वर्ष - 6052 - 3266
  • 10 से 15 वर्ष - 6373 - 3469
  • 15 वर्ष से अधिक - 18776 - 10963

Edited By: Umesh Tiwari

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