लखनऊ, [जितेंद्र उपाध्याय]। आधी आबादी को आर्थिक आजादी देकर उनके सपनाे को साकार करने वाली इंदिरानगर की र‍िचा सक्सेना ने कुछ अलग करने का संकल्प लिया है। खादी में महात्मा गांधी की विचार धारा की झलक देखने वाली ऋचा ने जैविक खादी बनाकर मल्टीनेशन कंपनियों की नींद उड़ा दी है। अपनी तरह की इकलौती खादी अब राजधानी ही नहीं सउदीअरब, नेपाल व आस्टे्लिया तक में धूम मचा रही है।

कोरोना संक्रमण काल में जब कामगार नौकरी को लेकर परेशान हैं तो इससे इतर र‍िचा ने 200 नई महिलाओं को काम देकर अपनी सोच को मूर्त रूप देने का काम किया। नारी को नारायणी का दर्जा देेने के उनके प्रयास के चलते अब महिलाए एक दिन में 500 से 700 रुपये कमा रही हैं। उन्होंने बताया कि 2018 में प्राकृतिक ऊर्जा में एमएससी करने के बाद इसी विषय में शोध शुरू किया है। नीदरलैंड विवि से पीएचडी कर रही हूं। इससे पहले 2015 में प्रोडक्शन ट्रेंड से बीटेक किया था। प्रेक्टिकल के दौरान कपड़ा बनाना सीखा और उसी काे आगे बढ़ाने में लग गई हूं। विकास के इस डिजिटल युग में कुछ अलग करना पड़ेगा तभी आपकी पहचान बनेगी। करीब 500 महिलाएं व पुरुष उनसे जुड़कर काम कर रहे हैं।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग की ओर से उनके कपड़े को मान्यता भी दे दी गई है। खादी एवं ग्रामोद्योग अधिकारी प्रशांत मिश्रा ने बताया कि जैविक खादी को मान्यता दी गई है। कपास के उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक उर्वरक व गोबर की खाद का प्रयोग होता है। इससे बने धागे से जैविक खादी बनती है आयोग की कई संस्थाएं भी इसे बनाने का प्रयास कर रही हैं।

ऐसे बनती है जैविक खादी : ऋचा सक्सेना ने बताया जैविक खादी बनाने के लिए जहां कपास की खेती होती है उन खेतों को हरी खाद से तैयार करने के साथ ही उसमें रासायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं किया जाता। गोबर की खाद हरी खाद के अलावा केंचुए से बनने वाली जैविक खाद का प्रयोग कि‍या जाता है। उससे तैयार होने वाले कपास से धागा बनाया जाता है। धागे की रंगाई भी फूलों से बनने वाले प्राकृतिक रंगों से की जाती है । इसके बाद इसकी हथकरघा से कपड़े की बुनाई होती है। इस कपड़े की खासियत यह है कि इसे जाड़ा और गर्मी दोनों ही समय पहना जा सकता है। गर्मी में ठंड का एहसास और जाड़े में गर्मी का एहसास यह कपड़ा दिलाता है। हालांकि इसकी कीमत सामान्य खादी के कपड़े से 30 से 40 फीसद अधिक होती है ,लेकिन शरीर के लिए यह कपड़ा अच्छा होता है। बाराबंकी और सीतापुर में जैविक खेती के माध्यम से कपास की खेती कराती हूं। किसानों के साथ करार है कि वे हमें ही कपास देंगे।

बचे कपड़े से बनाती हैं बैग : इटौंजा में जैविक धागा कातने का प्लांट लगाया है जिसमे गांधी के चरखे से ही धागा बनाया जाएगा है। धागा बनने के बाद बाराबंकी के बड़ा गांव मेें कपड़े की बिनाई होती है। पिछले वर्ष कोरोना काल में आस्ट्रेलिया से 1500 मीटर कपड़े की मांग आई थी और उन्होंने उसे पूरा किया। कपड़े की कतरन से वह अब हैंडबैग बनाकर महिलाओं को अतिरिक्त काम दे रही हैं। अगरबत्ती बनाने का काम शुरू कर दिया है।

Edited By: Anurag Gupta