लखनऊ: समाजवाद की धार, सदन में तर्क और तंज के उस्ताद थे रामगोविंद चौधरी
अनुभवी समाजवादी नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी का लखनऊ के पीजीआई में निधन हो गया। बलिया से ...और पढ़ें
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HighLights
अनुभवी समाजवादी नेता राम गोविंद चौधरी का लखनऊ में निधन।
सदन में अपनी प्रभावी भाषण शैली और तर्कों के लिए प्रसिद्ध।
कई बार मंत्री और नेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य किया।
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। एक और खांटी समाजवादी नेता राम गोविंद चौधरी हमारे बीच नहीं रहे। जयप्रकाश नारायण और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के समाजवादी सिद्धांतों से प्रभावित चौधरी का नाम विधान सभा की उन आवाजों में दर्ज रहेगा, जिनकी अपनी अलग पहचान थी। बलिया की मिट्टी से निकले इस नेता की भाषण शैली में जमीनी मुद्दों की पकड़ के साथ ही संसदीय मर्यादा का अनोखा संगम था।
वह सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं लगाते थे बल्कि आंकड़ों, उदाहरणों और व्यंग्य से इस तरह जोड़ते कि सदन में उनकी बात देर तक चर्चा में रहती। मंत्री रहने से लेकर नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते समय उनके शब्द भले ही तीखे होते, लेकिन वह संसदीय परंपराओं का सदैव सम्मान करते थे।
शुक्रवार रात लखनऊ के पीजीआई में उनके निधन के साथ समाजवादी आंदोलन की उस पीढ़ी की एक मुखर आवाज खामोश हो गई, जिसने राजनीति को संघर्ष, विचार और संगठन के रास्ते देखा था। वह भारी-भरकम राजनीतिक शब्दावली के बजाय आम बोलचाल की भाषा में बड़ी बात कहने के लिए जाने जाते थे।
सरकार को घेरते हुए कभी किसी स्थानीय मुहावरे का सहारा लेते तो कभी रामचरितमानस की चौपाई या ग्रामीण संदर्भ से अपनी बात समझाते। वर्ष 2017 में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उनकी पहचान सरकार के सामने लगातार सवाल रखने वाले विपक्षी नेता की बनी।
वर्ष 2018 में राज्यपाल के अभिभाषण पर करीब डेढ़ घंटे के भाषण में उन्होंने उसे 'मिथ्या प्रवचन पुस्तिका' तक कह दिया था। किसानों की कर्जमाफी पर 'मोचन' शब्द को लेकर उन्होंने पूर्वांचल के स्थानीय अर्थ का हवाला देते हुए सरकार पर तंज कसा था। सदन में उनकी आवाज ऊंची जरूर होती थी, लेकिन पहचान शोर की नहीं, अपनी बात कहने के अंदाज की थी।
बाद के वर्षों में वह सार्वजनिक रूप से राजनीति में शालीनता और मर्यादा की बात करते रहे। उन्होंने कहा था कि राजनीति में शालीनता और मर्यादा सबसे बड़ी पूंजी है और समाजवादी कार्यकर्ताओं को भी अपशब्दों से बचना चाहिए। वर्ष 2022 में बांसडीह से चुनाव हारने के बाद विधान सभा की सक्रिय राजनीति से उनका प्रत्यक्ष रिश्ता भले खत्म हो गया, लेकिन उनकी सार्वजनिक सक्रियता बनी रही।
चंद्रशेखर को अपना राजनीतिक गुरु मानने वाले चौधरी पहली बार वर्ष 1977 में विधान सभा पहुंचे थे। आठ बार विधायक चुने गए चौधरी वर्ष 1990-91 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बने। वर्ष 2003 से 2007 तक मुलायम सरकार में बाल विकास एवं पुष्टाहार मंत्री रहे। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव सरकार में भी उन्हें मंत्री बनाया गया।
वर्ष 2017 में भाजपा सरकार बनने के बाद वह नेता प्रतिपक्ष बने। चौधरी की राजनीति की जमीन छात्र आंदोलन से तैयार हुई। बलिया के मुरली मनोहर टाउन महाविद्यालय में छात्र राजनीति से जुड़े और महामंत्री के बाद अध्यक्ष भी बने। आपातकाल के दौर में 19 महीने जेल में रहे।
