लखनऊ (दुर्गा शर्मा)। ''टोपी बेनाम पैदा हुआ था। नाम की जरूरत तो मरने वालों को होती है। गांधी भी बेनाम पैदा हुए थे और गोडसे भी। जन्म लेने के लिए आज तक किसी को नाम की जरूरत नहीं पड़ी है। पैदा तो केवल बच्चे होते हैं। मरते-मरते वह ¨हदू, मुसलमान, ईसाई, नास्तिक, ¨हदुस्तानी, पाकिस्तानी, गोरे, काले और जाने क्या-क्या हो जाते हैं..।''

उपन्यास 'टोपी शुक्ला' के इस अंश के साथ ही डॉ. राही मासूम रजा की हर कृति आज भी प्रासंगिक है। उनका नायक समय और भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही। सच, बेबाक और धारदार लेखन में बेपर्द जीवन यथार्थ उकेरा। कलम ने कट्टरता का विरोध किया। अपने पात्रों को गालियों की हद तक अभिव्यक्ति की पूर्ण आजादी देने वाले डॉ. राही मासूम रजा समय को विषय बनाकर हमेशा वक्त से आगे रहे।

सांप्रदायिकता के खिलाफ सृजनात्मक प्रहार 'आधा गांव' हो या वेश्यावृत्ति पर केंद्रित 'कारोबारे तमन्ना'। 'कयामत' के रूप में प्रेम विवाह, बेरोजगारी, जन्म से पहले विवाह तय करना और तलाक आदि समस्याओं पर मुखर रहे। व्यंग्य प्रधान शैली में 'टोपी शुक्ला' में ¨हदू-मुस्लिम संबंधों को पूरी सच्चाई के साथ पेश कर बुद्धिजीवियों के सामने प्रश्नचिह्न खड़ा किया। 'हिम्मत जौनपुरी', 'कटरा बी आर्जू' , 'दिल एक सादा कागज', 'असंतोष के दिन', 'नीम का पेड़' और 'सीन 75'.. सामाजिक ताने बाने पर बुनी हर कृति समय का सशक्त हस्ताक्षर रही। 'महाभारत' पटकथा और संवाद लेखन से वह घरों के साथ-साथ दिलों में बस गए। उनके करीबी कहते हैं, सिर्फ कृतित्व नहीं व्यक्ति्व से भी डॉ. राही विद्रोही रहे।

कभी समझौता नहीं किया..

''यह आधा गांव अपने पूरे दोस्त कुंवरपाल सिंह को भेंट करता हूं, क्योंकि अगर उनका साथ न होता तो मैं यह कहानी लिख ही न पाता..''

राष्ट्रीयता के हक में ¨हदी कथा-साहित्य की बहुचर्चित और निर्विवाद उपलब्धि आधा गांव की इन लाइनों का जिक्र करते हुए वरिष्ठ कहानीकार एवं कुंवरपाल सिंह की पत्‍‌नी नमिता सिंह कहती हैं, राही और कुंवर अच्छे मित्रों में थे। कुंवर 'आधा गांव' की रचना प्रक्रिया के गवाह रहे। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दोनों की मुलाकात हुई थी। 1970 में कुंवर जी से मेरा विवाह हुआ। उसके बाद राही जी से संपर्क हुआ। 1973 में मेरी कृति छपी। उन्होंने सुझाव के साथ लंबा पत्र लिखा।

'लेखन में फालतू शब्दों का इस्तेमाल मत करो, एक बात को बार-बार मत कहो..' का मशविरा आज भी कहानियों की निर्ममता से एडिटिंग में मदद करती है। वह सामाजिक समस्याओं पर शिद्दत से सोचते थे। तल्ख टिप्पणियों के कारण हर किसी के निशाने पर रहे, पर कभी समझौता नहीं किया। मृत्यु से छह महीने पहले राही जी ने अखबारों में प्रकाशित और अप्रकाशित एक-एक कतरन एकत्र कर दो मोटी फाइलों के रूप में रजिस्टर्ड डाक से कुंवर जी के पास भेजा था। बोले, इसका तुम जो चाहो करो। राही जी की मृत्यु के बाद उसी फाइल से मैटर निकाल तीन किताबें 'बेकार गए हम', 'खुदाहाफिज कहने का मोड़' और 'सिनेमा और संस्कृति' आई। अंत समय तक कलम का साथ न छूटा। राही जी हमेशा कहते थे..

मेर तीन माएं हैं, एक जिसने मुझे जन्म दिया। दूसरा अलीगढ़ विवि और तीसरी गंगा..। हमारे आइडियल रहे मासूम मामू

करामत हुसैन मुस्लिम ग‌र्ल्स कॉलेज, निशातगंज में उर्दू विभाग की विभागाध्यक्ष एवं राही जी की भांजी डॉ. शबनम रिजवी बताती हैं, मासूम मामू परिवार के बच्चों और युवाओं के आइडियल रहे। ज्यादातर बच्चों के नाम उन्हीं ने रखे। उनका प्यार भरा लहजा, चलने का अनोखा अंदाज, पान का डिब्बा, बटुवा, अलीगढ़ी पायजामा, रामपुरी बारीक कढ़ाई का कुर्ता, नागरा जूता और स्टाइल के साथ शेरवानी खुली हुई। सबसे ज्यादा तफसीली मुलाकातें और बातें अलीगढ़ में होती थीं। हम वहीं मिलते थे।

डॉ. शबनम कहती हैं, मैं दिल्ली विवि से एम. फिल करने वाली थी। मामू ने 'इस्मत चुगताई' दी का नाम सुझाया था। पीएचडी वह चाहते थे कि इस्मत दी पर करूं पर ऐसा नहीं हो पाया। मामू से मेहनत करना सीखा। जब उन्होंने महाभारत के एपीसोड लिखना शुरू किया, उससे पहले पांच वर्षो तक महाभारत की कथा, कहानी, किस्सों और किरदारों पर गहरी रिसर्च की। लिखने से पहले खूब गौरों-ओ-फिर्क किया करते और कलम चलती तो चलती ही चली जाती। वह एक साथ कई काम किया करते थे। एक तरफ महाभारत का एपीसोड लिख रहे थे। दूसरी तरफ किसी पत्रिका या अखबार के लिए लेख लिखा जा रहा था। उसी में कुछ कविता लेखन भी हो गया। कहानी का प्लाट जेहन में आया तो उसे भी तहरीर कर लिया। फिल्म का डायलॉग भी जेहन में आया जा रहा था। हर फन मौला आदमी से मामू घर गृहस्थी, खानदान, रिश्तेदार, नाते दार.. सभी का ख्याल रखते थे। खुद न पहुंचते, पर उनका पैगाम व तोहफा जरूर पहुंच जाता। कवि और शायर भी उम्दा थे..

मानव विज्ञान विभाग, लविवि के पूर्व विभागाध्यक्ष और राही जी की बड़ी बहन बाकरी बेगम के पुत्र प्रो. नदीम हसनैन कहते हैं, मामू करिश्माई व्यक्तित्व के खूबसूरत व्यक्ति थे। वह थोड़ा लंगड़ा कर चलते थे, पर उसमें भी सुंदरता थी। हम थोड़ा बड़े हुए तो वह अलीगढ़ छोड़कर मुंबई चले गए। वह खुद भी निर्भीक थे और अपने पात्रों को भी खूब आजादी देते थे। वह मेरे लिए साहित्यकार से पहले एक शायर और कवि हृदय व्यक्ति रहे। उनकी कविता..

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है

मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो

लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है

मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव को फेंको

और उस योगी से कह दो- महादेव

अब इस गंगा को वापस ले लो

यह जलील तुर्को के बदन में गढा गया

लहू बनकर दौड़ रही है।। विचारों से कायम सौहार्द

डॉ. राही मासूम रजा साहित्य एकेडमी के संस्थापक राम किशोर कहते हैं, उनके उपन्यास पढ़े। उसके बाद लगा यही व्यक्ति है जिसके सहारे देश और समाज को सही दिशा में ले जा सकते हैं। इनके ही विचारों द्वारा समाज में सौहार्द, भाईचारा और अमन स्थापित किया जा सकता है। तब पांच लोगों के साथ मिलकर डॉ. राही मासूम रजा साहित्य एकेडमी के साथ जयंती पर सम्मान समारोह की शुरुआत की। यह नवां साल है। डॉ. गिरिराज किशोर को सम्मान आज

गांधी भवन में अपराह्न 3:30 बजे से आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गिरिराज किशोर को डॉ. राही मासूम साहित्य सम्मान से अलंकृत किया जाएगा।

Posted By: Jagran

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