लखनऊ। प्रदेश सरकार ने कुंडा से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को फिर से उसी खाद्य एवं रसद महकमे का कार्यभार सौंपा है, जिसके घोटाले के आरोपों में वह पहले से ही घिरे हैं। सीबीआइ, यूपी पुलिस की ईओडब्ल्यू व खाद्य प्रकोष्ठ के साथ ही एसआइटी इस घोटाले की जाच कर रही है। रघुराज प्रताप को यह विभाग तीसरी बार मिला है। इसकी निगरानी को लेकर कल इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई तय है।

अखिलेश यादव ने 15 मार्च 2012 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ जिन विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलायी थी, उनमें रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया भी थे। उस समय भी उन्हें खाद्य एवं रसद विभाग का मंत्री बनाया गया। प्रतापगढ़ में कुंडा के सीओ जिया उल हक की हत्या में मंत्री रघुराज की भूमिका को लेकर सवाल उठने पर उनका मंत्री पद से इस्तीफा हो गया। जिया उल हक हत्याकांड में सीबीआइ से क्लीन मिलने पर 11 अक्टूबर को राजा भैया को फिर मंत्री पद की शपथ दिलाई गई। उस दिन उन्हें विभाग नहीं दिया गया लेकिन समर्थकों की ओर से दावा किया जाता रहा कि खाद्य एवं रसद विभाग ही दिया जाएगा। आखिर कल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खाद्य एवं रसद विभाग रघुराज प्रताप सिंह को सौंप दिया। इस फैसले से राज्य सरकार सवालों के घेरे में आ गयी है।

वर्ष 2005 में रघुराज प्रताप सिंह के खाद्य एवं रसद मंत्री रहने के दौरान गरीबों के अनाज को खाद्यान्न माफिया ने बांग्लादेश ले जाकर बेचा था। इस घोटाले की जाच के लिए काग्रेस नेता रहे विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

इस खाद्यान्न घोटाले की जाच सीबीआइ को और यूपी पुलिस की तीन जाच एजेंसियों को प्रदेश के अंदर हुए घोटाले की जाच सौंपी गई। जाच के दौरान खाद्य प्रकोष्ठ के एसपी रहे जसवीर सिंह ने मंत्री रघुराज प्रताप की संलिप्तता का अंदेशा जताते हुए सीबीआइ निदेशक को बयान दर्ज करने के लिए चिट्ठी लिखी थी। घोटाले में अभी जाच चल रही है।

प्रदेश में 2000 में खाद्यन्न घोटाला सामने आया था। कांग्रेस के नेता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने 2005 में घोटाले की जांच के लिए कोर्ट में याचिका दायर की। इस बीच सरकार ने भी कुछ प्रकरणों की जांच शुरू करा दी। इसी बीच 16 दिसंबर 2007 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआइ को इस घोटाले की जांच करने का निर्देश दिया। प्रारंभिक जांच के बाद सीबीआइ ने कहा कि इस घोटाले में पांच हजार से अधिक मुकदमे दर्ज करने होंगे। इतने संसाधन नहीं हैं, इस कारण हम जांच नहीं कर सकते। सीबीआइ के इस निर्णय के खिलाफ विश्वनाथ चतुर्वेदी ने अप्रैल 2008 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को 20 मार्च 2009 को खारिज करने हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में नई याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया। नवंबर 2009 में फिर याचिका दाखिल की गई। याचिका पर हाईकोर्ट ने सीबीआइ को छह माह में जांच पूरी करने का निर्देश भी दिया। फैसले के विरोध में मायावती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसमें आरोपियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति पर तकनीकी रोक लगा दी। इसी वर्ष एक मई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी अधिकारियों ने खिलाफ अभियोजन स्वीकृति छह माह के अंदर दी जाए और पूरी तफ्तीश की निगरानी हाईकोर्ट करेगा।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस